सोमवार, 9 मई 2016

सत्संग से गुरुकृपा की लहर

चित्तसे  जबतक  प्रपंच  बिलकुल उत्तर  नहीं  जाता , तबतक  परमार्थ  नहीं  सूझता , नहीं  भाता , नहीं ठहरता।  मनोभूमि  जब वैराग्य  से  शूद्ध  हो जाती है , तब  उससे  बोया हुआ  ज्ञानबीज  अंकुरित  होता  है।

सतत  सत्संग , सैट-संग  का  अध्ययन , गुरुकृपा  और  आत्मारामकी  भेट -यही  वह  क्रमसे  जीव  संसार के  कोलाहल से  मुक्त  होता है।

प्रारब्धवश  जिस  जातिमे  हम  पैदा  हुए  उसी  जातिमे  रहकर  तथा  उसी  जातिके  कर्म  करते हुए  प्रेमसे  नारायण का  भजन  करे  और तर जाएँ --इतना  ही अपना  कर्तब्य  हे।

सुगम  मार्ग  से चलो  और  सुखसे  राम-कृष्ण  हरिनाम  लेते चलो।  वैकुंठका  यही  अच्छा  और समिपका  रास्ता  है।

जिस  सत्संगसे  भगवत्प्रेम  उदय  होता है  वही  सत्संग  है , बाकि  तो  नरकनिबास  है।

संतोंके द्वारपर  श्वान  होकर  पड़े  रहना  भी  बड़ा  भाग्य  है , क्योंकि  वहाँ  प्रसाद  मिलता  हे  और  भगवान्  का  गुणगान  सुननेमें  आता  हे।

कीर्तन  का  अधिकार  सबको है , इसमें  वर्ण या  आश्रमका  भेद -भाव  नहीं।




बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

संसार , प्रेम , भक्ति और भगवान्

संसार , सच  कहिये  तो  दुःखोंका  घर  है।  जन्म -मरण के  महादुःखके  बीचमे  घूमनेवाले  इस संसार मे  जो भी  आया  वह  दुःखोंका  मेहमान  हुआ। 

संसार  दुःख  स्वरुप  है , यही तो  शास्त्रका  सिद्धान्त  हे  और  यही  जीवमात्रका  अन्तिम  अनुभव है। 

भगवत्संकल्पके  अनुसार  ही  सृष्टिके  सब  व्यापार  हुआ  करते है।  सामान्य  जीव  सांसारिक  दुःखोंकी  चक्रमे  पीस   जाते है , पर वे  ही  दुःख  भाग्यवान्  पुरुषोंके  उद्धारका  कारण बनते  हैं। 

सच्चा  प्रेम  कभी मरता  नहीं , काल भी  उसे  मार नहीं  सकता। 

प्रेम तो  निष्काम -निर्विषय  ही होता है  और उसका  एकमात्र  भाजन  परमात्मा  है।  ऐसा  प्रेम  भक्तोंके  ही  भाग्यमें होता है। 

भक्तोमे  सच्चाई  होती है।  वैराग्य  के  अंजनमे  जब  आँखें  खुल  जाती है , तब  नश्वर  संसार के  भेद -भावोमे  बंटे  हुए  प्रेमको  एक जगह  बटोरकर  वे  एक  परमात्मा को  अर्पण  कर देते  है।  फिर  प्रेमामृतकी  धारा  भगवान के सम्मुख ही  प्रबाहित होने लगती  हे। 

सबके  परम सुहृद  प्रभु  जो कुछ  करते हैं , उसीमे हमारा  परम हित  है। 

भगवान्  भक्तको  गृहप्रपंच  करने ही  नहीं देते।  सब झंझटोंसे  अलग रखते  है। 

बहुत  मारा -मारा  फिरा।  लूट  गया।  तड़पते ही दिन  बिट रहे  है।  हे दीनानाथ ! संसारमें  विरद  रखो। 

निःसार  है  यह  संसार। यहाँ  सर केवल  भगवान है। 


संसार  काळग्रस्त , नश्वर  और दुःख स्वरुप  है।  इसका  सारा  घटाटोप  व्यर्थ  है।  भगवान्  मिले  तो  ही  जन्म सफल  है। 

यह  सब  नाशवान  है , गोपालकों  स्मरण कर , वही हित है। 

सुख  देखिये तो  राई -बराबर  है  और  दुःख  पर्वत  के  बराबर। 

यह संसार  दुःखसे  बंधा  है , इसमें  सुखका  विचार  तो  कहीं भी  नहीं है। 

देह  नाशवान  है।  देह  मृत्युकी  धौकनी  है।  संसार  केवल  दुःख स्वरुप है।  सब भाई -बंधू  सुखके साथी है। 

संसार मिथ्या  है --यह  ज्ञात  हुआ  और आँखे  खुली।  दुःख में  आँखे खुलती है , तब  दुःख  ही अनुग्रह  जान  पड़ता  है। 

खटमलभरी  खाटपर  मीठी निंदका  लगना  जैसे  असंभव  है , वैसे  ही  अनित्य  संसारके  भरोसे  सुख  मिलना  भी असंभव है। 

विरक्तिके बिना  ज्ञान  नहीं ठहर  सकता।  देह्सहित  सम्पूर्ण  दृश्यमान  संसारके  नश्वरत्वकी  मुद्रा  जबतक चित्तपर  अंकित नहीं हो जाती , तबतक  वहाँ  ज्ञान नहीं  ठहर  सकता। 

यह  समस्त  संसार  अनित्य है , इस अनित्यताको  जहाँ  जान लिया  तहाँ  वैराग्य  हाथ धोकर  पीछे पद जाता है।  ऐसा  दृढ़तर  वैराग्य  उत्पन्न  होना  ही  तो  भगवान् की  दया  है। 

वैराग्य  खेल नहीं , भगवान की  दया हो तो  ही उसका  लाभ  होता है। 

भगवान जिस पर  अनुग्रह  करना  चाहते है , उसे वे पहले  वैराग्य दान करते है। 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

भगवान् -भक्त के सम्बन्ध माता और पुत्र के सम्बन्ध के सामान

संतोंकी  मामूली  बातें  महान उपदेश  होती है।  चित्त में  पड़ी हुई  गांठ  उनके  शब्दमात्रसे  छिद  जाती है। इसीलिए  बुध्हिमानोंको  चाहिए की सत्संग  करें।  सत्संगमें  साधकोंकी  भवपाश  काट जाते है। 

हृदयमे  प्रभुका  नित्य ध्यान  हो , मुखसे  उनका  नामकीर्तन  हो , कानोंमे  सदा  उनकी  ही कथा  गूंजती हो , प्रेमानन्दमे  उनकी ही  पूजा  हो , नेत्रोंमे  हरिकी  मूर्ति विराज रही हो , चरणोंसे उनके ही स्थानकी यात्रा  हो , रासनामे  प्रभुके तीर्थ  का  रस  हो , भोजन  हो तो  वह प्रभुका प्रसाद ही  हो।  साष्टांग  नमन  हो उनके प्रति , आलिंगन  हो  अह्लादसे  उनके ही भक्तोंका  और  एक क्या आधा  पल  भी  उनकी  सेवाके बिना व्यर्थ  न जाए।  सब  धर्मोमे  यही श्रेष्ठ  धर्म है। 

बछड़ेपर  गौका  जो  भाव  होता है , उसी भावसे  हरी  मुझे  संभाले  हुए  है। 

बच्चे  अनेक  प्रकारकी  बोलिओंसे  माताको  पुकारते हैं , पर उन  बोलिओं का  यथातथ्य  ज्ञान  माताको ही होता है। 

संतोने  मर्मकी  बात  खोलकर बता  दी है  --हाथमे  झांज --मंजीरा  ले  लो  और  नाचो।  समाधिके  सुखको  इसपर  न्योछावर  कर दो।  ऐसा  ब्रह्मरस  इस नाम -संकीर्तन में  भरा हुआ  है। 

यह  समझ  लो  की  चारों  मुक्तियाँ  हरिदासोंकी दासियाँ है। 

सदा -सर्वदा  नाम --संकीर्तन  और  हरिकथा  गान  होनेसे  चित्तमे  अखण्ड  आनन्द  बना रहता है।  सम्पूर्ण  सुख  और  श्रृंगार  इसीमे मैंने  पा  लिया और  अब  आनन्दमे  झूम रहा हूँ।  अब  कहीं  कोई  कमी  ही  नहीं रहीं।  इसी देहमे  विदेहका  आनन्द  ले  रहा हूँ। 

नाम का  अखण्ड प्रेम -प्रवाह  चला है।  राम -कृष्ण , नारायण -नाम  अखण्ड  जीवन  है , कहींसे  भी  खण्डित  होनेवाला  नहीं। 

वह  कुल  पवित्र है , वह  देश  पवन है , जहाँ  हरिके  दास  जन्म लेते हैं। 

बाल -बच्चोंकी  लिए  जमीन -जायदाद  रख  जानेवाले  माँ -बाप  क्या  काम है ? दुर्लभ हैं  वे  ही  जो  अपनी  सन्ततिके  लिए  भगवद्भक्तिकी   सम्पति छोड़ जाते हैं । 

भगवान् की  यह पहचान  है की  जिसके  घर आते  है उसकी  घोर  विपत्तिमें  भी सुख  सौभाग्य  दिखाई  देता है। 

मातासे  बच्चेको यह  नहीं  कहना पड़ता  की तुम  मुझे  सम्भालो।  माता तो स्वभावसे ही उसे अपनी  छाती से  लगाए  रहती है।  इसीलिए  में  भी  सोच-विचार क्यों करूँ? जिसके  शिर  जो भार  है  वाही संभाले। 

बिना मांगे  ही  माँ  बच्चेको  खिलाती  है  और  बच्चा  जितना  भी  खाय  खिलनेसे  माता  कभी नहीं  अघाती।  खेल  खेलने में  बच्चा  भुला  रहे  तो  भी  माता  उसे  नहीं  भुलाती , बरकस  पकड़कर  उसे छाती से   चिपका  लेती  और  स्तनपान  कराती है।  बच्चेको कोई  पीड़ा हो तो  माता भाड़की  लईके  समान  बिकल  हो  उठती है। 

प्रभुका  स्नेह  माताके  स्नेहसे  भी  बढ़कर  है , फिर  सोच -विचार  क्यों करूँ ? जिसके  सिर  जो भर है  वही जाने। 

बच्चेको  उठाकर  छातीसे  लगालेना  ही  माताका  सबसे  बड़ा  सुख है।  माता उसके हाथमे  गुड़िया  देती  और  उसके कौतुक  देख  अपने  जिको  ठंडा  करती है।  उसे  आभूषण  पहनाती  और उसकी  शोभा  देख परम प्रसन्न  होती  है।  उसे अपनी  गोदमे  उठा  लेती और टकटकी लगाये  उसका  मुँह  निहारती  है।  माता  बच्चेका  रोना  सह नहीं सकती। 

मातृस्तन्मे  मुह  लगाते  ही  माताके  दूध  भर  आता है।  माँ बच्चे दोनों  लाड लड़ाते  हुए  एक  दूसरे की  इच्छा  पूरी  करते  हैं, पर  सारा  भार  है  माता के सिर। 

माताके  चित्तमे  बालक  ही भरा  रहता है।  उसे  अपनी  देहकी  सुध  नहीं  रहती।  बच्चेको  जहाँ  उसने उठा लिया वहीँ  सारी  थकावट  उसकी  दूर  हो जाती है। 

बच्चेकी  अटपटी बातें  माताको  अच्छी लगती  है।  इसी प्रकार  भगवान का  जो प्रेमी  है , उसका  सभी कुछ  भगवान्  को  प्यार  लगता  है  और  भगवान्  उसकी  सब  मनःकामनाएं  पूर्ण  करते है। 

गाय  जंगलमे  चरने  जाती है , पर  चित्त उसका  गोठमे  बंधे  बछड़ेपर ही रहता  है। मैया  मेरी ! मुझे  भी ऐसा  ही बना ले ,अपने  चरणो में  स्थान  देकर  रख ले। 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

भक्त, भगवान और नाम

शम -दम  आज्ञाकारी  सेवक  होकर  सेवक  होकर  भक्तके  द्वारपर  हाथ  जोड़े  खड़े  रहते  है।  ऋद्धि -सिद्धि  दासी  बनकर  घरमे  काम करती है।  विवेक  टहलुआ  सदा  हाजिर  ही रहता है। 
भक्तके  प्रत्येक  शवदसे  प्रभुकी  ही  वार्ता  उठती है  और श्रोता  सुनकर  तल्लीन हो जाता  है। 

चारो  मुक्ति  मिलकर  भक्तके घर  पानी भरती है  और  श्रीके  साथ श्रीहरि  भी  उसकी   सेवामे  रहते है ---औरोकी बात  ही क्या  है ?

भक्त  भगवानकी  आत्मा  हे , वह  भगवानका  जीवन है  प्राण  है। 

प्रभु  पूर्णतः  भक्तके  अंदर  है  और  भक्त  पूर्णतः  भगवानके  अंदर  है। 

साधनोमे  मुख्य  साधन  श्रीहरिकी  भक्ति ही है।  भक्तिमें  भी  नाम  कीर्तन  विशेष है --नामसे चित  शुद्धि  होती  है --साधकोंकी  चित्त - शुद्धि  होती है --साधकोंकी  स्वरुप -स्थिति  प्राप्त  होती है। 

नाम --जैसा और  कोई  साधन  नहीं  है।  नामसे  भव -बंधन  कट  जाते हैं। 

मन ने  सबको  बाँध  रखा  है।  मनको  बाँधना  आसान  नहीं।  मनने  देवताओंको  पस्त  कर  डाला।  वह  इन्द्रिओंको  क्या  समझता  है। मनकी  भार  बड़ी  जबरदस्त  है।  मनके  सामने  कौन  ठहर  सकता  है। 

हरिसे  हिरा  काटा  जाता है।  वैसे  ही  मनसे  मन  पकड़ा  जाता  है , पर  यह  भी  तब  होता है जब  पूर्ण  हरी कृपा  होता  है।

मन  ही  मनका  बोधक , मन  ही मनका  साधक , मन ही मनका  बाधक  और मन ही मनका घातक है।

अष्टांगयोग , वेदाध्ययन , सत्यवचन  तथा  अन्य  जो -जो  साधन है , उन सधोनो  से  जो कुछ  मिलता  है  वह  सब  भगवत्भजनसे  प्राप्त  होता है।

निरपेक्ष  ही धीर  होता है।  धैर्य उसके  चरण  छूटा है।  जो अधीर है  उससे  निरपेक्षता  नहीं होती।

कोटि -कोटि  जन्मोंकी  अनुभवके बाद  निरपेक्षता  अति  है।  निरपेक्षता से  बढ़कर कोई साधन नहीं।

एकान्त  भक्तिका  लक्षण  यह है की  भगवान्  और  भक्तका  एकान्त  होता है।  भक्त  भगवान्में  मिल जाता है  और  भगवान् भक्तोंमे  मिल जाते हैं।

जिसकी  भेदबुद्धि  नहीं  रही , जिसे  संतत्वका  बोध हो गया , उसीको  सर्वत्र  भगवत्स्वरुपके  अनुभवका  परमानन्द   प्राप्त होता है।

जो सदा सम भावमे  एकाग्र  रहते  हैं , प्रभुके  भजन में  ही तत्पर  रहते हैं , वे  प्रकृतिके पार पहुंचकर  प्रभुके  स्वरूपको प्राप्त होते हैं।

जिसके ह्रदय मे विषयसे विरक्ति हो , अभेदभावसे  श्रीहरिचरनोमे  भक्ति  हो ,  भजनमे अनन्य  प्रीति  हो  उसके  स्वयं  श्रीहरि ही आज्ञां  कारक  है।

जो  शिश्नोदरभोगमे  ही आसक्त  है , जो अधर्म्मे  रत है , ऐसे विषयसक्तोंको  असाधु समझो।  उसका  संग मात करो।  कर्मणा, वाचा , मनसा उसका त्याग कर दो।

जो बड़ा  भरी  विरक्त बनता है , पर हृदयमे अधर्मकामरत  रहता  है , कामवश  द्वेष  करता है  वह  भी  निश्चित  कुसंग है।

जो बड़ा  सात्विक बनता  है , पर ह्रदय में  संतोंकी  दोष  देखता  है  वह अतिदुष्ट  दुःसंग है।

पर  सबसे  मुख्य  दुःसंग  अपना ही काम है , अपनी ही  सकमता  है।  इसे  समूल त्याग  देनेसे  ही  दुःसंगता  त्यागी जाती है।  उस काम -कल्पनाको  जो  नर त्यागता है , उसके लिए  संसार सुख स्वरुप होता है।

उस काम -कल्पना  को  त्यागनेका  मुख्य  साधन  केवल  सत्संग है।  संतोंके  श्रीचरणोंको  वंदन करनेसे  काम मारा  जाता है।

सत्संगके  बिना  जो साधन है , वह साधकोंको  बांधनेवाला  कठिन  बंधन है।  सत्संग के बिना जो त्याग है , वह केवल पाखंड है। 

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

परमात्मा का दास बनो और नरदेह को समझो

गृहस्थाश्रममे  रहकर भी जिसका  चित्त प्रभुके  रंग में  रंग गया  और  इस  कारण  जिसकी  गृहासक्ति  छूट गयी , उसे  गृहस्थाश्रम  में  भी  भगवत्प्राप्ति  होती  है  और  निजसम्बन्धमे  ही सारी  सुख  संपत्ति  मिल जाती  है। 

जीव  और  परमात्मा  दोनों एक है।  इस बात को  जान लेना  ही ज्ञान  है। वह  ऐक्य  लाभकर  परमात्म सुख  भोगना  सम्यक विज्ञानं है। 

मै  ही  देव  हूँ , मै  ही  भक्त  हूँ , पूजाकी  सामग्री  भी  मै  ही हूँ , मै  ही  अपनी  पूजा  करता  हूँ  यह  अभेद -उपासना का  एक रूप है। 

सहज अनुकम्पा से  प्रनिओं  के साथ  अन्न , वस्त्र , दान , मान  इत्यादि से  प्रिय आचरण  करना  चाहिए।  यही  सबका  स्वधर्म  है। 

पिता स्वयमेब  नारायण  है।  माता  प्रत्यक्ष  लक्ष्मी  है। ऐसे  भावसे  जो भजन  करता है , वाही सुपुत्र है। 

बहते पानी पर  चाहे  जितने लकीरें  खींचो  एक भी लकीर न खिंचेगी , वैसे  ही  सत्त्वशुद्धि  के  बिना  आत्मज्ञानकी  एक  किरण प्रकट न होगी। 

धन्य  है  नरदेह का मिलना , धन्य है   साधुओं का  सत्संग , धन्य है  व  भक्त जो भगवत्भक्ति में  रंग गए। 

वैष्ण्वोंको  जो एक जाती  मानता  है , शालग्राम को जो एक पाषाण  समझता  है , सद्गुरुको एक मनुष्य  मानता  है , उसने कुछ न समझा। 

जो निज सत्ता  छोड़कर पराधीन में  जा फंसा , उसे  स्वप्नमें  भी सुखकी वार्ता  नहीं  मिलती। 

जो धन के लोभ मे  फंसा हुआ है  , उसे कल्पनान्त  मे  भी मुक्ति  नहीं  मिल सकती।  जो  सर्वदा  स्त्री -कामी  है , उसे  परमार्थ  या  आत्मबोध  नहीं  मिल सकता।

जब  सूर्यनारायण  प्राची दिशा मे  आते है  तब  तारें  अस्त  हो जाते है। वैसे  ही  भक्तिके  प्रबोधकाल मे  कामादिकों की  होली हो जाती है। 

सत्य  के सामान कोई तप  नहीं  होती है  , सत्यके  समान  कोई जप नहीं है। सत्यसे सद्रूप प्राप्त  होता है।  सत्यसे साधक  निष्पाप  होते है। 

वाणीमे  चाहे  कोई सबसे श्रेष्ठ क्यों न हो , वह यदि  हरीचरणो  मे  विमुख है  तो  उससे वह चांडाल श्रेष्ठ है  जो प्रतिदिन  भगवत भजन करता है। 

अंतःशुद्धिका  मुख्य  साधन हरी कीर्तन  है।  नाम के समान  और कोई साधन ही नहीं। 

भक्त जहाँ रहता  है , वहां  सभी प्रकार  दिशाएं  सुखमय  हो जाती है। वह जहाँ  खड़ा होता है , वहां सुखसे महा सुख आकर रहता है। 

अभिमान  का सर्वथा  त्याग ही त्याग की मुख्य लक्षण  है।  

सम्पूर्ण  अभिमान को त्याग कर  प्रभुकी शरण मे  जानेसे तुम जन्म-मरण  आदिके  द्वन्द्से  तर जाओगे। 

जो  हृदयस्थ है  उसकी शरण लो। 

प्रभुकी प्राप्ति मे  सबसे बड़ा बाधक है  अभिमान। 

प्रभुकी शरणमे जानेसे  प्रभुका  सारा बल प्राप्त हो जाता है, सारा भवभय  भाग जाता  है। कलिकाल  काम्पने  लगता है। 

समर्पण का  सरल उपाय है नाम स्मरण।  नामस्मरणसे  पाप भस्म  होते है। 

सकाम  नाम स्मरण करनेसे  व  नाम जो इच्छा  हो  वह  पूरी कर देता है।  निष्काम  नामस्मरण  करनेसे  वह नाम  पापको  भस्म  कर देता है। 

मनके श्रीकृष्णार्पण  होनेसे  भक्ति उल्लसित  होती है। 

अष्ट  महासिद्धियां  भक्तके चरणोमे  लोटा करती है  , वह उनकी और  देखता तक नहीं। 

जिस  भक्तको  प्रभुकी भक्ति प्राप्त हो ,उसके  सभी  व्यापर भगवत  आकार हो  जाते है। 

भक्त  जिस और रहता है , वह दिशा  श्रीकृष्ण  बन जाती है।  वह जब भोजन करने बैठता  है  तब  उसकेलिए  हरी ही षडरस  हो जाते है  . उसे जल पिलानेके  लिए  प्रभु ही जल बन जाते है। 

जब भक्त  पैदल  चलता  है  तो  शांति पद-पद पर उसके लिए  मृदु पादासन बिछाती  और उसकी  आरती  उतारती है। 

रविवार, 24 जनवरी 2016

बुराई को त्यागकर अच्छाई पकड़ें

मानव समाज सदिओं से  कुछ न कुछ बिचार धारा  का  परिवर्तन  करके जीवन को सुन्दर बनाने का प्रयास करते आ रहा हे।  मस्तिष्क  में नई  शोच लाकर  समाज में सुधार लानेका  काम कर रहा हे। धीरे  धीरे समाज में कुछ गलत विचार के कारण ये समाज कलुषित  होने जा रहा है।  जो  विभिन्न  घटना एवं दुर्घटना को जन्म दे रहा है। आइए  इन विचारों को बदलने का प्रयास करें।   व्यक्तिगत एवं  सामाजिक  विचारों का बदलने का कोशिस  करें। 

सबसे पहले  व्यक्तिगत  दोषों को परिवर्तन करें--

आलस्य को त्याग करें -समय बर्बाद करना , धीमी धीमी  गति  से  अनियमित  एवं  अस्त -व्यस्त  ढंग  से काम करना , परिश्रम  से जी चुराना , दिनचर्या  निर्धारित  न करना  आदि दोषों को  त्याग करें। 

अस्वछ्ता  त्याग करें --शरीर , बस्त्र , घर एवं  प्रयोग  में  आने  वाले  उपकरण को  गंदा  एवं अव्यवस्थित  रखना ,सफाई  एवं  सुसज्जा  में लापरवाही  बरतना , गंदगी  को  दूर करने में  उपेक्षा  करना  आदि विचार  छोड़ दें। 

 असंयमता को  त्याग करें --भोजन का चटोरपन , अनियमित  एवं असात्विक  आहार , कामुकता  की मनोवृति  एवं  अमर्यादित  प्रवृत्ति , वाचालता , निरर्थक बकवास , चंचलता , अकारण शारीरिक  अंगों का  मटकना , खरच बजट बनाकर  न करना , धन तथा  अन्य  सम्पतियों , विभूतियों  का अपव्यय , फैशन , ठाठ-बाठ  एवं  सज-धज  और  श्रृंगारपरक  फजूलखर्ची  आदि का  त्याग करें। 

अशिष्टता को त्याग करें --कटुभाषण , रुखा व्यवहार , सज्जनोचित  व्यवहार  की  कमी , बड़ों  का  असम्मान , मारपीट , गली -गुलज , उत्स्रुखल  चेष्टाएँ , नागरिक  कर्त्तव्यों  की  उपेक्षा , शेख़ीख़ोरी , आत्मप्रशंसा , अपने स्तर  से ऊँचे  स्थान  पर जा बैठना , अवांछित  मेहमान  बनना , दूसरों  का  अनावश्यक  समय  नष्ट  करना  आदि  गुणों  का  त्याग करें। 

दुर्भावनाएँ  त्याग करें -- आवेश , उत्तेजना , आपे से  बाहर होना , क्रोध , केवल दोष  ही ढूंढ़ते  रहना , कृतघ्नता , शत्रुता , अविवेकपूर्ण  आग्रह , दूसरों की  स्थिति  न समझकर  हर अप्रिय  स्थिति  को  दुष्टता  मानना , गरीवी  का तिरष्कार , अमीरी की चापलूसी  करना  आदि गुणों  को त्याग करें। 

बेईमानी करना  त्याग दें --असत्य  व्यवहार  और  अनाचरण , धोखेबाजी , छल , विस्वसघात , उत्तरदायित्वों  से  इंकार , कामचोर , उचट से  अधिक  पैसा लेना , हराम  की कमाई , प्रतिज्ञा  से मुकरना , अमानत  में खयानत ,अपनी वस्तुस्थिति  को बढाकर  बताना  आदि दोषों को त्याग दें। 

निष्ठुरता  जैसी  गुणों को त्याग करें --अनुदार स्वभाव , उपेक्षापूर्ण  व्यवहार , दुखिओं के प्रति  सहानुभूति  का  आभाव , अपने  मतलब  से  मतलब रखने की  स्वार्थता , किसी के काम न आना , पशुओं से अनुचित  काम लेना , सताना , शोषण  एवं  उत्पीड़न  की प्रवृत्ति , शिकार  खेलना , मांसाहार , हत्या किए  हुए  जानवरों का चमड़ा  प्रयोग करना , पक्षिओं  को पिंजड़े में  बंद  रखना , बैल , भैसा , तितर , मुर्गे  आदि पशु-पक्षिओं का लड़ना आदि गुणों  का  त्याग करें। 

व्यसन से दूर रहें  --तम्बाकू , शराव आदि नशों का सेवन , ताश , चोपड़ , शतरंज  आदि में अनावश्यक  समय गँवाना , जुआ , सिनेमा  आदि  मनोरजोनो में  अत्यधिक दिल्चप्सी , मटरगस्ती , लापरवाही  से समय  तथा  धन की  बर्बादी , व्यभिचार  आदि  से दूर रहें। 

असामाजिकता  न बनेँ --समाज के प्रति  अपने  उत्तरदायित्व  की उपेक्षा  सामूहिक  कार्यों  में अरुचि , व्यक्तिगत  स्वार्थपरता  में निमग्नता , अपनी ही दौलत , अमीरी तथा  सुख -सुविधा  बढ़ाने में  मस्त  रहना।  समाज की दुर्गति  तथा  प्रगति से  उदासीन  रहना , व्यक्तिगत  स्वार्थ  के लिए  सामाजिक  अव्यबस्था  फैलाने  में  संकोच  न करना।

कायरता  की गुण को  त्याग करना --अन्यायी के अप्रसन्न  होने से उत्पन्न  होने  वाली  हानि की आशंका  से अनीति  सहते रहना , अनाचार का  विरोध न करना।  दुष्टता  के समर्थन से लाभ मिलने के कारण  उसकी  सहायता  करने लगना , अनुचित को  अनुचित कहने में संकोच करना  आदि गुणों को त्याग करना। 

रविवार, 3 जनवरी 2016

मीठी वाणी का धारा

भगवान   श्रीकृष्ण  समस्त  जगतके  एकमात्र  स्वामी  है।  उनका ऐश्वर्य , माधुर्य , वात्सल्य  सभी  अनन्त  है , अपार  है।  जिसे  उसका  एक कण  भी मिल गया  वह  धन्य  धन्य  हो गया।

सभी  वैभववाले , बड़ी  आयुवाले , बड़ी  महिमावाले , आखिर  चले गए  मृत्युपथमें  ही।  सब  चले गए ; परन्तु  एक ही  रहे जो  स्वरूपकार  हुए --आत्मज्ञानी  हुए।

जिस वाणी में  हरिकथा - प्रेम है , वही  वाणी सरस  है।

प्रेम के बिना  श्रुति , स्मृति , ज्ञान  , पूजन , श्रवण  , कीर्तन  सब व्यर्थ  है।


संत का  जीवन  और मरण  हरिमय  होता  है , हरिके  सिवा  और  है  ही क्या   की  हो।  फिर  मृत्यु  के  समय  भी  हरी  स्मरण  के सिवा  और क्या  हो सकता  है। 

जो  चीनी की  मिठास  है , वाही  चीनी   है।  वैसे  ही चिदात्मा  जो  है , वही  यह  लोक है , संसार में  हरी से  भिन्न  और  कुछ  भी नहीं है। 

जो कुछ  सुन्दर  दिखाई देता है , वह श्रीकृष्ण  के  ही अंश  से ही है।  उससे  ऑंखें  ऐसी  दीवानी  हो गई  की  भगवान  के  मयूरपिच्छ में  जा लगी। 

जिसने  एकबार  श्रीकृष्ण  को  देखा , उसकी  आँखें  फिर  उससे नहीं फिरती।  अधिकाधिक  उसी रूप को  आलिंगन  करती है  और  उसीमें  लीन  हो जाती है। 
 कुल- कर्म को  मिटाना  हो , अपने  साथ सबको  मिट्टी  में  मिलाना  हो , जीवतक का अन्त  करना  है  कोई कृष्ण  को  वरण  करे। 

उठो ! श्रीकृष्ण के  चरणो  का  वंदन  करो।  लज्जा  और  अभिमान  छोड़ दो , मनको  निर्विकल्प  कर लो  और  वृत्ती  को  सावधान  करके  हरी चरणों को  वंदन  करो।

श्रीचरणों का  आलिंगन होते ही  अहं - सोहं की  गांठ  खुल  गयी।  सारा संसार  आनंदमय  हो गया।  सेव्य - सेवक  भावोंका कोई चिन्ह  नहीं रह गया।  देवी और देव एक हो गए।

सच्चा  विरक्त  उसीको कहना  जो  मानके  स्तान  से  डोर रहता  है।  वह  सत्संगमें  स्थिर रहता  है।  अपना  कोई  नया  सम्प्रदाय  नहीं चलाता  , नया  अखाडा  नहीं खोलता  , अपनी गद्दी  नहीं कायम  करता।   जीविका  के लिए दिन होकर   किसीकी  खुशामद  नहीं करता।  वह  लौकिक  नहीं होता , उसे  वस्त्रालंकार की  इच्छा  नहीं होती।  परान्नमें  रूचि  नहीं  होती , स्त्रियोंको देखना  उसे  अच्छा  नहीं  लगता।

अपनी  स्त्रीके  सिवा  अन्य  कोई  सम्बन्ध  न रखे।  अपने स्त्रीसे  भी केवल  समुचित  ही  सम्बन्ध  रखे और चिटको  कभी आसक्त  न होने दे।

प्रमदासंग से  बराबर  बचना  चाहिए।  जो निरभिमान  होकर  निःसंग  हो गया  हो ,वही  अखंड  एकांत - सेवन  कर सकता है।

स्त्री , धन  और प्रतिष्ठा  चिरंजीव- पद- प्राप्ति के  साधन में  तीन  महान विघ्न  है।

सच्चा  अनुताप  और शुद्ध  सात्विक  बैराग्य  यदि  न हो तो  श्रीकृष्ण पद  प्राप्त  करने की  आशा  करना  केवल  अज्ञान  है।

सुनो, मेरा  पागल प्रेम  ऐसा  है  की  सुन्दर  श्याम  श्रीराम  ही  मेरे  अद्वितीय  ब्रह्म  है  और  कुछ  मुझे नहीं मालूम।  रामके  बिना  जो  ब्रम्हज्ञान  है  हनुमानजी  गरजकर  कहते है  की  उसकी  हमें  कोई  जरुरत  नहीं।  हमारा ब्रम्ह  तो राम है।

जो मोल  लेकर  गन्दी मदिरा  पान  करता  है ,  वही  उसके नशेमे चूर होकर  नाचता -गाता  है , तब  जिसने भगवत्प्रेमकी  दिव्या मदिरा का  सेवन  किया हो , वह कैसे  चुपचाप बैठ सकता है।

भगवानके  चरणों में  अपरोक्ष  स्थिति  हो जाय  तो  वहां  क्षणार्धमें  होनेवाली  प्राप्तिके  सामने  त्रिभुवन - विभव-संपत्ति  भी  भक्त के लिए  तृण  के समान  है।

याचना  किये बिना  यदृच्छासे  जो  कुछ  मिले  उसे  साधक  मंगलमय  प्रभुका  महाप्रसाद  समझकर  स्वनदसे  भोग लगावे।

दारा , सुत , गृह , प्राण  सब  भगवनको  अर्पण  कर देना  चाहिए।  यह  पूर्ण भागवत  धर्म  है।  मुख्यतः  इसीका  नाम भजन है।

साधु-संतोंसे  मैत्री  करो ,सबसे पुराना  परिचय  रखो , सबके श्रेष्ठ  सखा  बनो , सबके साथ  सामान रहो।

भगवान्की  अचरसहित  भक्ति  सब योगोंका  योगगह्वर , वेदांतका  निजभण्डार , सकल  सिद्धिओंका  परम  सार  है। 

रविवार, 27 सितंबर 2015

अमृत धारा

संतोंकी  जीवनचर्या संसारके  लिए  आइनेके सामान  होती  है।

सब भूतोंसे  समदृष्टि से  केवल  एक  हरिको  ही देखना  चाहिए।

जो  निर्द्वंद होकर  निंदा  सह  लेता  है  उसकी  माता  धन्य है।

भगवन ही  सब  साधनोंके  सध्य है  और  सब  चराचर  प्राणिओंमे  भगवान् को  देखकर  सर्वत्र   अखंड
 भगवतबृद्धि को  स्थिर  रखना  और  सबके  कल्याणका  उद्योग  करना  अर्थात  लोकसंग्रह  और
 लोकोपकारमे  तन- मन -प्राण  अर्पण  करना  ही  सच्ची  हरी  भक्त  है।

समदर्शी , निरपेक्ष  और  निरहंकार  होकर  सब  भूतोंमें  भगवान  भरे  है  ऐसा  जानकर  जो  लोकोपकार  होता है  वही  उत्तम  हरी  भजन है।

सब  प्रनिओंमें  भगवान् को  विद्यमान  जानकर  उनके  हितार्थ  अहंभावरहित  होकर  कायेन -मनसा - बाचा  उद्योग  करना ही  भगवन की  सेवा  है।

जो स्थूल  है  वही  सुख्म  है , दॄश्य है  वही  अदृश्य  है , व्यक्त  है  वही  अव्यक्त  है , सगुण  है  वही  निर्गुण  है , अंदर  है  वही  बाहर  है।

भगवन  सर्वत्र  है , पर  जो  भक्त  नहीं है , उन्हें  नहीं  दिखाई  देते।  जलमें , स्थलमें , पथरमे  कहाँ  नहीं  है , जिधर  देखो उधर ही भगवन  है , पर  अभक्तोंको  केवल  शुन्य  दिखाई  देता  है।

एकत्वके  साथ  सृष्टिको  देखनेसे  दृष्टिमे भगवन ही भर जाते  हैं।

धन्य  है  सतगुरु  जिन्होंने  गोविन्द  दिखा  दिया।

संथोकी  घर-द्धार , अंदर - बाहर , कर्ममें , बाणीमे  और मनमे  भगबतभक्तिके  सिबा  और  कुछ  भी  नहीं  मिल सकता।

संतोंके  कर्म ,ज्ञान  और  भक्ति  हरिमय  होते  है।  शांति, क्ष्यमा , दया  आदि  देबी  गुण  संतोंके  आँगनमे  लोटा  करते है।

संत  सेवा  मुक्तिका  द्वार  है।

भगवान्  स्वयं  संतोंके  घरमें  घुसकर  अपना  दखल  जमाते हैं।

सद्गुरुके  सामने  वेद  मौन  हो गये , शास्त्र  दीवाने  हो  गए  और वाक्  भी  बंद  हो  गयी।  सद्गुरुकी  कृपादृष्टि  जिसपर  पड़ती है , उसकी  दृष्टिमें  सारे  सृष्टि  श्रीहरिमय  हो जाती  है।

धन्य  है  श्रीगुरुदेव  जिन्होंने  अखण्ड  नाम- स्मरण  करा दिया।

सद्गुरुचरणो का  लाभ  जिसे  हो गया , वह  प्रपंचसे  मुक्त हो गया।

सारा  प्रपंच  छोड़कर  भगवत चरण  का  ही  सदा  ध्यान  करना  चाहिए।

सद्गुरुका  सहारा  जिसे मिल गया , कलिकाल  उसका  कुछ  बिगाड़  नहीं  सकता।

भक्ति, बैराग्य  और  ज्ञानका  स्वयं  आचरण  करके  दूसरोंकी  इसी  आचरण में  लगानेका  नाम  ही  लोकसंग्रह  है।

सिद्धिओंकी  मनोरथ  केवल  मनोरंजन  है , उनमें  परमार्थ  नहीं , प्रायः  बने  हुए  लोग ही  सिद्धिओंका  बाजार  लगाते  है  और  गऱीबोंको  ठगते  है।

कलिकाल  बड़ा  भीषण है , इसमें  केवल  प्रभुके  नामका ही  सहारा है।

इन्द्र और चींटी  दोनों  देहतः  सामान है।  देहमात्र ही  नस्वर है।  सबके  शरीर  नाशवान  है।  शरीरका  पर्दा  हटाकर  देखो  तो सर्वत्र  भगवान  ही है।  भगवान  सिबा  और क्या  है ? अपनी  दृष्टी  चिन्मय हो  तो  सर्वत्र  श्रीहरि  ही है।

श्रीकृष्ण  तो  सर्वत्र रम  रहे है।  वह संपूर्ण  विश्व के  अंदर  और  बाहर  व्याप्त  है।  जहाँ  हो  वहीँ  देखो , वहीँ  तुम्हे  वह दर्शन  देंगे।

दृश्य , दर्शन , द्रष्टा -- तीनोका  पाकर  देखो  तो  बस  श्रीकृष्ण  -ही - श्रीकृष्ण है।


बुधवार, 2 सितंबर 2015

अमृत वाणी

पहले  ईश्वरको  प्राप्त  करनेकी  चेष्टा  करो।   गुरुवाक्यमें  विश्वास  करके  कुछ  कर्म  करो।  गुरु  न  हो  तो  भगवान के  पास  व्याकुल  प्राणसे  प्रार्थना  करो।  वह  उन्हीकी  कृपासे  मालूम हो  जायेगा।

सांसारिक  पुरुष  धन , मान , बिषयादि  असार  वस्तुओंका  संग्रह  कर  सुखकी  आशा  करते  हैं।  परन्तु  वह  सब  किसी  प्रकारकी  सुख  नहीं  दे  सकते। 

भगवान्  जीवको  पापसे  लिपटा  रहने  नहीं  देता।  वह  दया कर  झट  उसका  उद्धार  कर  देता  है। 

पूर्व  दिशा में  जितना  ही  चलोगे  पश्चिम  दिशा  उतनीही  दूर  होती  जाएगी।  इसी  प्रकार  धर्म  पथपर  जितना  ही  अग्रसर  होओगे , संसार  उतनीही  दूर  पीछे  छूटता  जाएगा। 

कलियुगमें  प्रेम पूर्ण  ईश्वरकी  ही  सर्वश्रेष्ठ  तथा  सार  वस्तु  है। 

भगवान्  सबको  देखते हैं , किन्तु  जबतक  वे किसीको  अपनी  इछा से  दिखाई  नहीं  देते  तबतक  कोई  उनको  देख या  पहचान  नहीं  सकता।

प्रेमसे  हरिनाम  गाओ।  प्रेमसे  कीर्तन - रंगमें  मस्त  होकर  नाचो।  इससे  तरोगे , तरोगे।  संसारसे  तर  जाओगे।

गुरु  ही  माता , गुरु  ही  पिता  और  गुरु  ही  हमारे  कुलदेव  है।  महान  संकट  पड़नेपर  आगे  पीछे  वही  हमारी  रक्षा  करनेवाले  हैं।  यह  काया , वाक्  और  मन  उन्हीकी  चरणोंमें  अर्पण है।

कीर्तनसे  स्वधर्मकी  बृद्धि  होती  है , कीर्तनसे  स्वधर्मकी प्राप्ति  होती  है , कीर्तनकी  सामने  मुक्ति  भी लज्जित  होकर  भाग  जाती है।

कलियुगमें  नाम स्मरण  और  हरी  कीर्तनसे  जीवमात्रका  उद्धार  होता  है।

सब  दानोंमेसे  श्रेष्ठ  दान अन्नदान  है  और उससे  भी श्रेष्ठ  दान ज्ञान दान  है।

बैठकर  राम-नामके  ध्यानका  अनुष्ठान  करें , उसीसे  मनको  दृढ़  कर  एकनिष्ठ  भावसे  मग्न  हो।  इससे  बढ़कर  कोई  साधन है  नहीं।

परद्रव्य  और  परदाराको  छूत  मानें।  इससे  बढ़कर  निर्मल  कोई तप  नहीं  है।

इस  कलियुगमें  राम -नाम के  सिवा  कोई  आधार  नहीं  है।

मनमें  भगवान् का  रूप  ऐसा  आकर  बैठजाए  की  जाग्रत , स्वप्न और सुसुप्ति  कोई  भी  अवस्था  याद  न  आवे।

इन  कानोंसे  तेरा  नाम  और गुण  सुनूंगा।  इस  पैरोंसे  तीर्थोंकी  ही  रास्ते  चलूँगा।  यह  नश्वर  देह  किस  कामकी ?

भगवन ! मुझे  ऐसी  प्रेम भक्ति  दे  की  मुंहसे  तेराही  नाम  अखण्डरूपसे  लेता  रहूँ।

अपनी  स्तृति  और  दूस्ररोंकी  निंदा , है  गोविन्द ! में  कभी न करूँ।  सब  प्राणिओंमें  है  राम  ! में  तुम्हे  ही  देखूं  और  तेरे  प्रसादसे  ही  संतुष्ट  रहूँ।

भगवान्का  आवाहन  किया , पर  इस  आवाहनमें  विसर्जनका  कुछ  काम  नहीं।  जब  चित्त  उसीमें  लीन  होता  है  तो  गाते   भी  नहीं  बनता।

जो  सब  देबोंका  पिता है , उसके  चरोंोकि  शरण  लेते  ही  साडी  माया  छूट  जाती  है , सब  संदेह  नष्ट  हो  जाते  हैं।

वह  ज्ञानदीप  जलाया  जिससे  चिन्ताका  कोई  काजल  नहीं  और आनंद  भारित  प्रेमसे  देवाधिदेव  श्रीहरिकी  आरती  की। .सब भेद  और विकार  उड़  गए।

भीतर -बाहर , चर - अचरमें  सर्बत्र  श्रीहरि  ही  बिराज  रहें हैं।  उन्होंने  मेरा  मन  हर  लिया , मेरा - तेरा  भाव  निकाल दिया।

योग , तप , कर्म  और  ज्ञान --ये  सब भगवन के  लिए  है।  भगवान् के  बिना  इनका  कुछभी  मूल्य  नहीं  है।

भगवानके  चरणोंमें  संसारको  समर्पित  करके  भक्त  निश्चिन्त  रहते  हैं  और  तब  वह  सारा  प्रपंच  भगवान् का  ही  हो  जाता  है।

गंगा  सागरसे  मिलने  जाती  है ; परन्तु  जाती  हुई  जगत् का  पाप - ताप  निवारण  करती  है। उसी प्रकार आत्मस्वरूपको  प्राप्त  जो  संत  है  वे  अपने  सहज  कर्मोंसे  संसारमें  बंधे  बंदिओंको  छुड़ाते  हैं।



शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

ईश्वर की ओर

एक  ईश्वरको पकडे रहनेसे  इहलौकिक , पारलौकिक  अनेकों  लाभ  होते  है, पर ईश्वरको  त्यागते  ही  जीवका  सब  कुछ  व्यर्थ  हो जाता  है।

व्याकुल  होकर  उसके लिए  रोनेसे  ही  वह  मिलता  है।  लोग  लड़के - बच्चेके  लिए , रुपये - पैसे के  लिए  कितना  रोते  हैं , किन्तु  भगवान के  लिए  क्या  कोई  एक  बून्द  भी  आंसू  टपकता  है ; उसके  लिए  रोओ , आंसू  बहाओ  तब  उसको   पाओगे।

ईश्वरको  पानेका  उपाय  केवल  विश्वास  है।  जिसे   विश्वास  हो  गया, उसका  काम  बन  गया।

मुहंमेँ  राम  बगलमें  छुरी  मत  रखो।

ईश्वरके  नामसे  ऐसा  बिश्वास  चाहिए  की  मैंने  उसका  नाम  लिया  है , इससे  अब  मेरे  पाप कहाँ ? मेरे  अब  बंधन  कहाँ ?

एक ईश्वर  ही  सबका  गुरु  है।

जबतक  अज्ञान  है  तबतक  चोरसिका  चक्कर  है।

दूसरेको  सिखानेके  लिए  व्याकुल  मत  हो।  जिससे  तुम्हे  ज्ञान -भक्ति  प्राप्त  हो , ईश्वरके  चरण - कमल में  मन  लगे  वही  उपाय  करो।

परनिन्दा  और  परचर्चा  कभी  न  करो।

विश्वास  तरता  है और  अहंकार  डुबाता  है।

पहले  संसार  करके  पीछे  भगवान की  प्राप्तिकी  इच्छा  करते  हो।  ऐसा  न करके  पहले  भगवानको  लेकर  पीछे  संसार  करनेकी  इच्छा  क्यों  नहीं  करते  ? इससे  बहुत  सुख  पाओगे।

सात्विक  साधकमे  बहरी  दिखवेका  भाव  तनिक  भी  नहीं  रहता।

जो  मुर्ख  वासना के  रहते  गेरुआ  वस्त्र  धारण  करता  है  उसका  यह  लोक  और  परलोक  दोनो  नष्ट  हो  जाते  हैं।

वीर  साधक  इस  संसार का  बोझ  सिरपर  उठाकर  भी  भगवान्की  ओर  निहारते  रह  सकते  हैं।

विषयासक्ति  जितनी  ही  घटेगी  ईश्वरकी  प्रति  प्रेम  भी  उतना  ही बढ़ता  जाएगा।

देहको चाहे  जितना  सुख -दुःख  हो , भक्त  उसका  ख्याल  नहीं  करते।  उसकी  वृति  तो  प्रभुके  चरणोंमें  अनन्यभावसे  लगी  रहती  है।

तत्वज्ञान  होनेसे  मनुष्य का  पूर्व  स्वभाव्  बदल  जाता  है।

स्वामीके  जीते  रहते  ही  स्त्री  ब्रह्मचर्य  धारण  करती  है , वह  नारी  नहीं  है , वह  तो  साक्षात  भगवती  है।

ईश्वरका  प्रेम  पाकर  मनुष्य  साडी  बाह्य  वस्तुओंको  भूल  जाता है।   जगत् का  ख़याल  उसको  नहीं  रहता , यहांतक  की  सबसे  प्रिय  अपने  शरीरको  भी  भूल  जाता  है।  जब  ऐसी  अवस्था  आवे  तब  समझना  चाहिए  की  प्रेम  प्राप्त  हुआ।

प्रपंचमे  मनुष्यका  आत्मपतन  हो  ही  जाता  है।

अहंकार  करना  व्यर्थ  है।  जीवन , यौवन  कुछ भी  यहाँ  नहीं  रहेगा।  सब  दो  घडीका  सपना  है।

मनसे  रोकर भक्ति  मांगोगे  तो  वह  अवश्य  देगी।  इसमें  जरा  भी  शक  नहीं है।

ज्ञानोन्माद  होनेसे  कर्त्तव्य  फिर  कर्त्तव्य  नहीं  रह जाता।  उस  अवस्थामें  भगवान  उसका  भर  ले लेते  हैं।

ईश्वर हैं - इस  बातका  जिसे  ठीक बोध  हो  गया  वह  फिर सांसारिक  मायामें  नहीं  पड़ता।

पुस्तकें  हजार पढ़ो , मुखसे  हजार  श्लोक  कहो , पर  व्याकुल  होकर उसमें  डुबकी  नहीं  लगानेसे  उसे  पा  न  सकोगे।   

शनिवार, 22 अगस्त 2015

साधु वचन

साधकके  भीतर  यदि  कुछ  भी  आसक्ति  है  तो  समस्त  साधना  व्यर्थ  चली जाएगी।

जो  ईश्वर में  नित्य  डूबा रहताहै , उसकी  प्रेमाभक्ति  कभी  नहीं  सूखती।  परन्तु  दो -एक  दिनकि  भक्तिसे  ही जो  संतुष्ट  तथा  निश्चिंत रहता है , सिकेपर  रखेहुए  रिसते  घड़ेके  जलके  समान  वह  भक्ति  दो  दिन  बाद  ही  सुख  जाती  है।

जगतमें  ईश्वर  ब्याप्त  है , पर  उनके  पानेके  लिए साधना  करनी  पड़ती  है।

जिस  मनसे  साधना  करनी  है , वही  यदि  बिषयासक्त  हो  जाय तो  फिर  साधना  असंभव  ही  समझो।

जलमें  नाव  रहे  तो  कोई  हानि  नहीं , पर  नावमें  जल  नहीं  रहना  चाहिए।  साधक  संसारमें  रहे  तो  कोई  हानि  नहीं , परन्तु  साधकके  भीतर  संसार  नहीं  होना  चाहिये।

मन  और  मुखको  एक  करना  ही  साधना  है।

ईश्वर महान  होनेपर  भी  अपने  भक्तका  तुच्छ  उपहार  प्रेमपूर्वक  प्रसन्न  होकर  ग्रहण  करते हैं।

जिस  आदमीकी  ईश्वरके  नाममे  रूचि  है , भगवान् में  जिसकी  लगन  लग  गयी  है , उसका  संसार -विकार  अवश्य  दूर  होगा।  उसपर  भगवान्  की  कृपा  अवश्य -अवश्य  होगी।

अपने  सब  कर्मफल  ईश्वरको  अर्पण  कर  दो।  अपने लिए  किसी  फलकी  कामना  न  करो।

वासना  लेशमात्र  भी  रही  तो  भगवान  नहीं  मिल  सकते।

अहंकारकी  आड़  होनेसे  ईश्वर  नहीं  देख  पड़ते।  अहंबुद्धिके  जातेही  सब जंजाल  दूर हो जाते हैं।

में  प्रभु का  दास  हूँ , में  उसकी  संतान  हूँ , में  उसका  अंश  हूँ ---ये  सतत  अहंकार  अच्छे  है।  ऐसे  अभिमान से  भगवान  मिलते हैं।

जिसका (साधन ) यहाँ  ठीक  है  उसका  वहां  भी  ठीक  है  और  जिसका यहाँ  नहीं है  उसका  वहां  भी  नहीं  है।
जिसका  जैसा  भाव  होता  है , उसकी  वैसा  ही  फल  मिलता  है।

सफ़ेद  कपड़ेमें  थोड़ी  भी  स्याहिका  दाग  पडनेसे  वह  दाग  बहुत  स्पष्ट  दीखता  है , उसी  प्रकार  पवित्र  मनुष्य  का  थोडा दोष  भी  अधिक  दिखलाई  देता है।

जिस  घरमें  नित्य  हरि - कीर्तन  होता  है , वहां  कलियुग  प्रवेश  नहीं  कर  सकता।

जब  भगवान के  आश्रित  हो  रहे हो  तो  यह  न  हुआ , वह  न हुआ  आदि  चिंताओं से  मत  पडो।

विश्वासी  भक्त  आजीवन  भगवान् का  दर्शन  न मिलकर भी  भगवान को  नहीं छोड़ता।

संसार कच्चा  कुआँ है।  इसके  किनारेपर  खूब  सावधानीसे    खड़े  होना  चाहिए। तनिक  असावधान  होते  ही  कुएँमें  गिर पड़ोगे , तब  निकलना  कठिन  हो जाएगा।

संसारी  ! तुम संसारका सब  काम  करो ; किन्तु  मन हर घडी  संसारमें  विमुख  रखो।

कामिनी  और  कंचन  ही  माया  है।   इनके  आकर्षणमें  पड़नेपर  जीवकी  सब  स्वाधीनता  चली जाती  है। इनके  मोहके  कारण  ही जीव  भव - बन्धनमें  पड  जाता  है।

संसारमें  रहनेसे  सुख -दुःख  रहेगा ही।  ईश्वरकी  बात  अलग है  और  उसके  चरण- कमलमें  मन लगाना और है।  दुःख के  हाथसे  छुटकारा  पानेका और  कोई उपाय  नहीं।

साधु -संग  करनेसे  जीवका  मायारूपी  नशा  उतर  जाता है।

जिससे  दस  आदमी  अच्छी  प्रेरणा  पाते  हो  तथा  शुभ  कार्यमें  लगते  हो  तो  समझना  चाहिए  की उसके  भीतर  भगवान् की  विभूति  अधिक है।

जो सोचता है  में जीव  हूँ  वह  जीव है ; और  जो सोचताहै  में  शिव हूँ , वह  शिव  है।



शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

सच्चे बात

पहले ईश्वर-प्राप्तिका यत्न करो ,पीछे जो इच्छा से कर सकते हो।

जो ईश्वरपर निर्भर करते हैं ,उन्हें ईश्वर जैसे चलाते हैं ,उनकी अपनी कोई चेस्टा नहीं होती।

गुरु लाखों मिलते हैं ,पर चेला एक भी नहीं मिलता। उपदेश करनेवाले अनेकों मिलते हैं।,पर उपदेश पालन करनेवाले विरले ही।

ईश्वरका प्रकार सबके हृदयमें समान होनेपर भी वह साधुओंके हृदयमें अधिक प्रकाशित होता है।

समाधी अवस्थामें मनको उतना ही आनंद मिलता है, जितना जीती मच्छ्लिको तलावमें छोड़ देनेसे।

ज्ञान पुरुष है ,भक्ति स्त्री है।  पुरुष माया नरिसे तभी छूट सकता है जब वह परम बैरागी हो। किन्तु  भक्तिसे तो माया सहज ही  छूटी हुई है।

काजलकी कोठरीमें कित्ना भी  बचकर रहो , कुछ -न -कुछ कसौस  लगेगी  ही।  इसी  प्रकार  युवक  युवती  परस्पर  बहुत  साबधानीके  साथ  रहें  तो  भी कुछ -न -कुछ  काम जागेगा ही।

जिस  प्रकार  दर्पण  स्वछ  होनेपर  उसमें  मुहं  दिखलाई  देने लगता  है , उसी  प्रकार  हृदयके  स्वछ  होते ही  उसमें  भगवान् का  रूप दिखाई  देने  लगता  है।

ईश्वरको  अपना  समझकर  किसी एक भावसे उसकी सेवा -पूजा  करनेका  नाम  भक्तियोग  है।

कलियुगमें  और योगोंकी  अपेक्षा  भक्तियोगसे  सहज ही ईश्वरकी  प्राप्ति होतीहै।

ध्यान  करना  चाहते  तो  तीन  जगह  कर  सकते  हो -मनमें  , घरके  कोनेमें  और  बनमें।

केवल  ईश्वर - ज्ञान  ही  ज्ञान है। और  सब  अज्ञान  है।

भगवन  भक्तिके  वश  है ,वे अपनी  ओर  ममता  और  प्रेम  चाहते  हैं।

जिसके  मनमें  ईश्वरका  प्रेम  उत्पन्न  हो  गया , उसे  संसारका  कोई  सुख  अच्छा  नहीं  लगता।

जो  प्रभुके  प्रेममें  बावला  हो  गया  है , जिसने अपना  सब कुछ  उनके  चरणोंमें  अर्पण  कर  दिया  है , उसका  सारा  भार  प्रभु  अपने  ऊपर  ले लेते  हैं।

संसारमे  आकर  भगवान के  बिषयमे  तर्क , युक्ति , विचार  आदि  करनेसे  कुछ  फल नहीं।  जो प्रभुकी  प्राप्तकर  आनन्दानुभव  कर सकता  है , वही धन्य  है।

 सभी  मनुष्य  जन्म -जन्मान्तरमे  कभी -न -कभी  भगवान को  देखेंगे  ही।

सुईकी  छेदमें  धागा  पहनाना  चाहते  हो  तो  उसे  पतला  करो।  मनको  ईश्वरमें  फिरोना  चाहते  तो  दिन -हीन  अकिंचन  बनो।

भक्त का  ह्रदय  भगवान की  बैठक है।

संसारमें  जो जितना  सह सकता  है , वह  उतना ही  महात्मा  है।

जिसका  मनरूप  चुम्बकयंत्र  भगवान के  चरण -कमलोंकी  ओर  रहता  है ,उसके डूब  जाने  या राह भूलनेका डर  नहीं।

साधना की  राहमें  कई बार  गिरना -उठना  होता  है ,परन्तु  प्रयत्न  करनेपर  फिर  साधन  ठीक हो  जाता है।

सर्वदा  सत्य  बोलना  चाहिए।  कलिकालमें  सत्यका  आश्रय  लेनेके  बाद  और  किसी  साधनाका  काम  नहीं।
सत्य  ही कलिकाल  का  तपस्या  है।

संसारके  यश  और  निंदाके  कोई  परबाह  न  करके  ईश्वरकी  पथमें  चलना  चाहिए।

एक  महात्मा की  कृपासे  कितने ही  जीबोंका  उद्धार  हो जाता है।

सोमवार, 10 अगस्त 2015

अनमोल वचन

ईश्वरके दर्शन इच्छा रखनेवालोंको नाममें विश्वास तथा सत्यासत्यका विचार करते रहना चाहिये।

मनको स्वतंत्र छोड़ देनेपर वह नाना प्रकारके संकल्प, विकल्प करने लगता है।, परन्तु विचाररूपी अंकुशसे मरनेपर वह स्थिर हो जाता है।

हरिनाम सुनते ही जिसकी आखोंसे सच्चे प्रेमाश्रु बह निकलते हैं वही नाम-प्रेमी है।

डुबकी लगाते ही जाओ ,रत्न अवश्य मिलेगा। धीरज रखकर साधना करते रहो ,यथासमय अवश्य ही तुम्हारे ऊपर ईश्वरकी कृपा होगी।

साधुसँगको धर्मका सर्वप्रधान अंग समझना चाहिये।

मरनेके समय मनमें जैसा भाव होता है ,दूसरे वैसी ही गति होती है ,इसीलिये जीवनभर भगवानके स्मरणकी आवश्यकता है ,जिससे मृत्युके समय केवल भगवान ही याद आवें।

बालककी नाईं रोना ही साधकका एकमात्र बल है।

फाल्के बड़े होनेपर फूल अपने -आप गिर जाता है ,इसी प्रकार देवत्वके बढ़नेसे नरटवा नहीं रहता।

मनुष्य तभीतक धर्मके विषयमें तर्क-वितर्क करता है ,जबतक उसे धर्मका स्वाद नहीं मिलता। स्वाद मिलनपर वह चुपचाप साधन करने लगता है।

साधक जब गद्गद हो पुकारता है ,तब प्रभु बिलम्ब नहीं कर सकते।

ईश्वरके अनंत नाम है ,अनन्त रूप है ,अनंत भाव है। उसे किसी नामसे किसी रूपसे और किसी भावसे कोई पुकारे वह सबकी पुकार सुन सकता है ,वह सबकी मनःकामना पूरी कर सकता है।

परमात्मा एक है ,उसको अनेक लोग अनेक भावोंसे भजते हैं।

जिस हृदयमें ईश्वरका प्रेम प्रवेश कर गया उस हृदयसे काम ,क्रोध ,अहंकार आदि सब भाग जाते हैं। वे फिर नहीं ठहर सकते।

सब धर्मोंका आदर करो ,पर आपने मनको अपनी ही धर्मनिष्ठा से तृप्त करो।

साधन-भेजनेके द्वारा मनुष्य ईश्वरको पाकर फिर अपने धाम को लौट आजाता है।

ईश्वर हुम्लोगोंके निजके हैं ,वह हुम्लोगोंकी अपनी माता हैं। उनके पास हुम्लोगोंका जोर करना ,मचलना चलसकता है।

ईश्वर आपने आनेके पूर्व साधक के हृदयमें प्रेम ,भक्ति ,विश्वास तथा व्याकुलता पहले ही भर देते हैं।

हृदय स्थिर होनेसे ही ईश्वरका दर्शन होता है। हृदय- सरोवर  में जबतक कामनकी हवा बहती रहेगी ,तबतक ईश्वरका दर्शन असंभव है।

सच्चे विश्वासी भक्तिका विश्वास तथा भक्ति किसी प्रकार नष्ठ नहीं होती। भगवत चर्चा होते ही वह उन्मत्त हो उठता है।

विश्वासी भक्त ईश्वरके सिवा सांसारिक धन -मान  कुछ भी लेना नहीं चाहता।

संसारमें ईश्वर ही केवल सत्य है और सभी असत्य है।

दुर्लभ मनुष्य -जन्म पाकर जो व्यक्ति ईश्वरकी प्राप्तिके लिये यत्न नहीं करता उसका जन्म वृथा ही है।

ईश्वरमें भक्ति और अटूट निष्ठा करके संसारका सब काम करनेमें जीव संसार -बंधनों नहीं पड़ता।

जो ईश्वरका चरण -कमल पकड़ लेता है ,वह संसारसे नहीं डरता।

ईश्वरके चरण -कमल पकड़कर संसारका काम करो ,बन्धनका दर नहीं रहेगा।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

दिव्य वचन


सत्चिदानंद  प्रभुके अनेक रूप है, जिस साधकने हरिके  जिस रूपको देखा है, वह उनके उसी रूपको जनता है। यह सारे रूप उस एक ही बहुरुपिया हरिके है।

 आंखमिचौलीके खेलमे 'गोल ' छू लेनेपर फिर चोर नहीं होना पड़ता ,उसी प्रकार इस्वरको छूनेपर फिर सांसारिक बंधन नहीं बांधते।

लोहा जब एक बार पारस को  छूकर सोना हो जाता है,तब चाहे उसे मिट्टीके भीतर रखो या कुडे में फेंक दो। वह जहाँ रहेगा सोना ही रहेगा ,लोहा न होगा। इसी प्रकार जो इश्वर को पचुका है ,वह बस्तीमें रहे चाहे जंगलमें ,उसको फिर डेग नहीं लगा सकता।
 ईश्वरको प्राप्त कर लेनेपर मनुष्यका आकर वही रहता है,परन्तु उससे अशुभ कर्म नहीं होते।

ईश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य फिर जगतके जंजालमें नहीं पड़ता ,ईश्वरको छोड़कर एक क्षण भी उसे शांति नहीं मिलती ,एक क्षण भी ईश्वरको छोड़ने में मृत्यु -कष्ट होता है।

ईश्वरके पास जानेके अनेकों उपाय है। सभी धर्म इसीके उपाय दिखला रहे है।

हे मनुष्यो ! तुम सांसारकी वस्तुओंमें भूले हुए हो ,यह सब छोड़कर जब तुम ईश्वरके लिए रओगे ,तब प्रभु उसी वक्त आकर तुम्हें गोदमें उठा लेंगे।

ईश्वरको देखना चाहते हो तो मायाको हटा दो।

इस सत्यको धारण करो कि भगवन न पराये है ,न तुमसे दूर है और न दुर्लभ ही है।

जिसने तुम्हें यहाँ भेजा है,उसने तुम्हारे भोजनका प्रबन्ध पहलेसे कर रखा है।

जिसकी साधना करनेकी तीव्र उत्कण्ठा होती है ,भगबान उसके पास सद्गुरु भेजदेते हैं। गुरु के लिये साधकोंको चिंता करनेकी आबश्यकता नहीं पड़ती।

मनुष्य देखनेमें कोई रूपबान ,कोई कुरूप ,कोई साधु ,कोई असाधु देख पड़ते हैं , परन्तु उन सबके भीतर एक ही ईश्वर विराजते हैं।

दुष्ट मनुष्यमें भी ईश्वरका निवास है ,परन्तु उसका संग करना उचित नहीं।

साधना अवस्था में ऐसे मनुष्यो से ,जो उपासना से ठठ्ठा करते हैं ,धर्म तथा धार्मिकोंकी निंदा करते हैं ,एकदम दूर रहना चाहिए। 

मायाको पहचान लेनेपर वह तुरंत भाग जाती है। 

दूधमें मख्खन रहता है ,पर मथनेसे ही निकलता है। वैसे ही जो ईश्वरको जानना चाहे वह उसका साधन -भजन करे। 

एक ज्ञान ज्ञान ,बहुत ज्ञान अज्ञान !

ईश्वर साकार -निराकार और क्या -क्या है ,यह हमलोग नहीं जानते। तुम्हे जो अच्छा लगे उसीमें विश्वास कर उसे पुकारो  ,तुम उसीके द्वारा उसे पाओगे। मिसरी की ङली चाहे जिस ओरसे ,चाहे जिस ढंग से तोड़ कर खाओ मीठी लगेगी ही। 

मन सफ़ेद कपडा है ,इसे जिस रंगमें डूबोगे वही रंग चढ़ जाएगा। 

व्याकुल प्राणसे जो ईश्वरको पुकारते हैं ,उनको गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है।

सच्चा शिष्य गुरुके किसी बाहरी कामपर लक्ष्य नहीं करता। वह तो केवल गुरुकी आज्ञाको ही सिर नवाकर पालन करता।

पतंग एक बार रौशनी देखकर फिर अन्धकारमें नहीं जाता ,चीटियाँ गुडमें प्राण दे देती है पर वहाँसे लौटती नहीं। इसी प्रकार भक्त जब एकबार प्रभुदर्शनका रसास्वादन कर लेते हैं ,तो उसके लिये प्राण दे देते हैं ,पर लौटते नहीं।
संसारमें रहकर जो साधन कर सकते हैं ,यथार्थमें वो ही वीर पुरुष हैं।

संसारमें रहकर सब काम करो ,पर ख़याल रखो कहीं इस्वरके लक्ष्यसे मन हैट न जाय।

कुलटा स्त्रियाँ माता-पिता तथा परिवार माता-पिता तथा परिवारबालोंकी साथ रहकर संसारके सभी कार्य करती है ,प्रभु उनका मन सदा अपने यारमें लगा रहता है। हे संसारी जीव। तुम भी मनको इश्वरमें लगाकर माता-पिता तथा परिवारका काम करते रहो।