सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

भगवान् -भक्त के सम्बन्ध माता और पुत्र के सम्बन्ध के सामान

संतोंकी  मामूली  बातें  महान उपदेश  होती है।  चित्त में  पड़ी हुई  गांठ  उनके  शब्दमात्रसे  छिद  जाती है। इसीलिए  बुध्हिमानोंको  चाहिए की सत्संग  करें।  सत्संगमें  साधकोंकी  भवपाश  काट जाते है। 

हृदयमे  प्रभुका  नित्य ध्यान  हो , मुखसे  उनका  नामकीर्तन  हो , कानोंमे  सदा  उनकी  ही कथा  गूंजती हो , प्रेमानन्दमे  उनकी ही  पूजा  हो , नेत्रोंमे  हरिकी  मूर्ति विराज रही हो , चरणोंसे उनके ही स्थानकी यात्रा  हो , रासनामे  प्रभुके तीर्थ  का  रस  हो , भोजन  हो तो  वह प्रभुका प्रसाद ही  हो।  साष्टांग  नमन  हो उनके प्रति , आलिंगन  हो  अह्लादसे  उनके ही भक्तोंका  और  एक क्या आधा  पल  भी  उनकी  सेवाके बिना व्यर्थ  न जाए।  सब  धर्मोमे  यही श्रेष्ठ  धर्म है। 

बछड़ेपर  गौका  जो  भाव  होता है , उसी भावसे  हरी  मुझे  संभाले  हुए  है। 

बच्चे  अनेक  प्रकारकी  बोलिओंसे  माताको  पुकारते हैं , पर उन  बोलिओं का  यथातथ्य  ज्ञान  माताको ही होता है। 

संतोने  मर्मकी  बात  खोलकर बता  दी है  --हाथमे  झांज --मंजीरा  ले  लो  और  नाचो।  समाधिके  सुखको  इसपर  न्योछावर  कर दो।  ऐसा  ब्रह्मरस  इस नाम -संकीर्तन में  भरा हुआ  है। 

यह  समझ  लो  की  चारों  मुक्तियाँ  हरिदासोंकी दासियाँ है। 

सदा -सर्वदा  नाम --संकीर्तन  और  हरिकथा  गान  होनेसे  चित्तमे  अखण्ड  आनन्द  बना रहता है।  सम्पूर्ण  सुख  और  श्रृंगार  इसीमे मैंने  पा  लिया और  अब  आनन्दमे  झूम रहा हूँ।  अब  कहीं  कोई  कमी  ही  नहीं रहीं।  इसी देहमे  विदेहका  आनन्द  ले  रहा हूँ। 

नाम का  अखण्ड प्रेम -प्रवाह  चला है।  राम -कृष्ण , नारायण -नाम  अखण्ड  जीवन  है , कहींसे  भी  खण्डित  होनेवाला  नहीं। 

वह  कुल  पवित्र है , वह  देश  पवन है , जहाँ  हरिके  दास  जन्म लेते हैं। 

बाल -बच्चोंकी  लिए  जमीन -जायदाद  रख  जानेवाले  माँ -बाप  क्या  काम है ? दुर्लभ हैं  वे  ही  जो  अपनी  सन्ततिके  लिए  भगवद्भक्तिकी   सम्पति छोड़ जाते हैं । 

भगवान् की  यह पहचान  है की  जिसके  घर आते  है उसकी  घोर  विपत्तिमें  भी सुख  सौभाग्य  दिखाई  देता है। 

मातासे  बच्चेको यह  नहीं  कहना पड़ता  की तुम  मुझे  सम्भालो।  माता तो स्वभावसे ही उसे अपनी  छाती से  लगाए  रहती है।  इसीलिए  में  भी  सोच-विचार क्यों करूँ? जिसके  शिर  जो भार  है  वाही संभाले। 

बिना मांगे  ही  माँ  बच्चेको  खिलाती  है  और  बच्चा  जितना  भी  खाय  खिलनेसे  माता  कभी नहीं  अघाती।  खेल  खेलने में  बच्चा  भुला  रहे  तो  भी  माता  उसे  नहीं  भुलाती , बरकस  पकड़कर  उसे छाती से   चिपका  लेती  और  स्तनपान  कराती है।  बच्चेको कोई  पीड़ा हो तो  माता भाड़की  लईके  समान  बिकल  हो  उठती है। 

प्रभुका  स्नेह  माताके  स्नेहसे  भी  बढ़कर  है , फिर  सोच -विचार  क्यों करूँ ? जिसके  सिर  जो भर है  वही जाने। 

बच्चेको  उठाकर  छातीसे  लगालेना  ही  माताका  सबसे  बड़ा  सुख है।  माता उसके हाथमे  गुड़िया  देती  और  उसके कौतुक  देख  अपने  जिको  ठंडा  करती है।  उसे  आभूषण  पहनाती  और उसकी  शोभा  देख परम प्रसन्न  होती  है।  उसे अपनी  गोदमे  उठा  लेती और टकटकी लगाये  उसका  मुँह  निहारती  है।  माता  बच्चेका  रोना  सह नहीं सकती। 

मातृस्तन्मे  मुह  लगाते  ही  माताके  दूध  भर  आता है।  माँ बच्चे दोनों  लाड लड़ाते  हुए  एक  दूसरे की  इच्छा  पूरी  करते  हैं, पर  सारा  भार  है  माता के सिर। 

माताके  चित्तमे  बालक  ही भरा  रहता है।  उसे  अपनी  देहकी  सुध  नहीं  रहती।  बच्चेको  जहाँ  उसने उठा लिया वहीँ  सारी  थकावट  उसकी  दूर  हो जाती है। 

बच्चेकी  अटपटी बातें  माताको  अच्छी लगती  है।  इसी प्रकार  भगवान का  जो प्रेमी  है , उसका  सभी कुछ  भगवान्  को  प्यार  लगता  है  और  भगवान्  उसकी  सब  मनःकामनाएं  पूर्ण  करते है। 

गाय  जंगलमे  चरने  जाती है , पर  चित्त उसका  गोठमे  बंधे  बछड़ेपर ही रहता  है। मैया  मेरी ! मुझे  भी ऐसा  ही बना ले ,अपने  चरणो में  स्थान  देकर  रख ले। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें