शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

सच्चे बात

पहले ईश्वर-प्राप्तिका यत्न करो ,पीछे जो इच्छा से कर सकते हो।

जो ईश्वरपर निर्भर करते हैं ,उन्हें ईश्वर जैसे चलाते हैं ,उनकी अपनी कोई चेस्टा नहीं होती।

गुरु लाखों मिलते हैं ,पर चेला एक भी नहीं मिलता। उपदेश करनेवाले अनेकों मिलते हैं।,पर उपदेश पालन करनेवाले विरले ही।

ईश्वरका प्रकार सबके हृदयमें समान होनेपर भी वह साधुओंके हृदयमें अधिक प्रकाशित होता है।

समाधी अवस्थामें मनको उतना ही आनंद मिलता है, जितना जीती मच्छ्लिको तलावमें छोड़ देनेसे।

ज्ञान पुरुष है ,भक्ति स्त्री है।  पुरुष माया नरिसे तभी छूट सकता है जब वह परम बैरागी हो। किन्तु  भक्तिसे तो माया सहज ही  छूटी हुई है।

काजलकी कोठरीमें कित्ना भी  बचकर रहो , कुछ -न -कुछ कसौस  लगेगी  ही।  इसी  प्रकार  युवक  युवती  परस्पर  बहुत  साबधानीके  साथ  रहें  तो  भी कुछ -न -कुछ  काम जागेगा ही।

जिस  प्रकार  दर्पण  स्वछ  होनेपर  उसमें  मुहं  दिखलाई  देने लगता  है , उसी  प्रकार  हृदयके  स्वछ  होते ही  उसमें  भगवान् का  रूप दिखाई  देने  लगता  है।

ईश्वरको  अपना  समझकर  किसी एक भावसे उसकी सेवा -पूजा  करनेका  नाम  भक्तियोग  है।

कलियुगमें  और योगोंकी  अपेक्षा  भक्तियोगसे  सहज ही ईश्वरकी  प्राप्ति होतीहै।

ध्यान  करना  चाहते  तो  तीन  जगह  कर  सकते  हो -मनमें  , घरके  कोनेमें  और  बनमें।

केवल  ईश्वर - ज्ञान  ही  ज्ञान है। और  सब  अज्ञान  है।

भगवन  भक्तिके  वश  है ,वे अपनी  ओर  ममता  और  प्रेम  चाहते  हैं।

जिसके  मनमें  ईश्वरका  प्रेम  उत्पन्न  हो  गया , उसे  संसारका  कोई  सुख  अच्छा  नहीं  लगता।

जो  प्रभुके  प्रेममें  बावला  हो  गया  है , जिसने अपना  सब कुछ  उनके  चरणोंमें  अर्पण  कर  दिया  है , उसका  सारा  भार  प्रभु  अपने  ऊपर  ले लेते  हैं।

संसारमे  आकर  भगवान के  बिषयमे  तर्क , युक्ति , विचार  आदि  करनेसे  कुछ  फल नहीं।  जो प्रभुकी  प्राप्तकर  आनन्दानुभव  कर सकता  है , वही धन्य  है।

 सभी  मनुष्य  जन्म -जन्मान्तरमे  कभी -न -कभी  भगवान को  देखेंगे  ही।

सुईकी  छेदमें  धागा  पहनाना  चाहते  हो  तो  उसे  पतला  करो।  मनको  ईश्वरमें  फिरोना  चाहते  तो  दिन -हीन  अकिंचन  बनो।

भक्त का  ह्रदय  भगवान की  बैठक है।

संसारमें  जो जितना  सह सकता  है , वह  उतना ही  महात्मा  है।

जिसका  मनरूप  चुम्बकयंत्र  भगवान के  चरण -कमलोंकी  ओर  रहता  है ,उसके डूब  जाने  या राह भूलनेका डर  नहीं।

साधना की  राहमें  कई बार  गिरना -उठना  होता  है ,परन्तु  प्रयत्न  करनेपर  फिर  साधन  ठीक हो  जाता है।

सर्वदा  सत्य  बोलना  चाहिए।  कलिकालमें  सत्यका  आश्रय  लेनेके  बाद  और  किसी  साधनाका  काम  नहीं।
सत्य  ही कलिकाल  का  तपस्या  है।

संसारके  यश  और  निंदाके  कोई  परबाह  न  करके  ईश्वरकी  पथमें  चलना  चाहिए।

एक  महात्मा की  कृपासे  कितने ही  जीबोंका  उद्धार  हो जाता है।

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