शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

दिव्य वचन


सत्चिदानंद  प्रभुके अनेक रूप है, जिस साधकने हरिके  जिस रूपको देखा है, वह उनके उसी रूपको जनता है। यह सारे रूप उस एक ही बहुरुपिया हरिके है।

 आंखमिचौलीके खेलमे 'गोल ' छू लेनेपर फिर चोर नहीं होना पड़ता ,उसी प्रकार इस्वरको छूनेपर फिर सांसारिक बंधन नहीं बांधते।

लोहा जब एक बार पारस को  छूकर सोना हो जाता है,तब चाहे उसे मिट्टीके भीतर रखो या कुडे में फेंक दो। वह जहाँ रहेगा सोना ही रहेगा ,लोहा न होगा। इसी प्रकार जो इश्वर को पचुका है ,वह बस्तीमें रहे चाहे जंगलमें ,उसको फिर डेग नहीं लगा सकता।
 ईश्वरको प्राप्त कर लेनेपर मनुष्यका आकर वही रहता है,परन्तु उससे अशुभ कर्म नहीं होते।

ईश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य फिर जगतके जंजालमें नहीं पड़ता ,ईश्वरको छोड़कर एक क्षण भी उसे शांति नहीं मिलती ,एक क्षण भी ईश्वरको छोड़ने में मृत्यु -कष्ट होता है।

ईश्वरके पास जानेके अनेकों उपाय है। सभी धर्म इसीके उपाय दिखला रहे है।

हे मनुष्यो ! तुम सांसारकी वस्तुओंमें भूले हुए हो ,यह सब छोड़कर जब तुम ईश्वरके लिए रओगे ,तब प्रभु उसी वक्त आकर तुम्हें गोदमें उठा लेंगे।

ईश्वरको देखना चाहते हो तो मायाको हटा दो।

इस सत्यको धारण करो कि भगवन न पराये है ,न तुमसे दूर है और न दुर्लभ ही है।

जिसने तुम्हें यहाँ भेजा है,उसने तुम्हारे भोजनका प्रबन्ध पहलेसे कर रखा है।

जिसकी साधना करनेकी तीव्र उत्कण्ठा होती है ,भगबान उसके पास सद्गुरु भेजदेते हैं। गुरु के लिये साधकोंको चिंता करनेकी आबश्यकता नहीं पड़ती।

मनुष्य देखनेमें कोई रूपबान ,कोई कुरूप ,कोई साधु ,कोई असाधु देख पड़ते हैं , परन्तु उन सबके भीतर एक ही ईश्वर विराजते हैं।

दुष्ट मनुष्यमें भी ईश्वरका निवास है ,परन्तु उसका संग करना उचित नहीं।

साधना अवस्था में ऐसे मनुष्यो से ,जो उपासना से ठठ्ठा करते हैं ,धर्म तथा धार्मिकोंकी निंदा करते हैं ,एकदम दूर रहना चाहिए। 

मायाको पहचान लेनेपर वह तुरंत भाग जाती है। 

दूधमें मख्खन रहता है ,पर मथनेसे ही निकलता है। वैसे ही जो ईश्वरको जानना चाहे वह उसका साधन -भजन करे। 

एक ज्ञान ज्ञान ,बहुत ज्ञान अज्ञान !

ईश्वर साकार -निराकार और क्या -क्या है ,यह हमलोग नहीं जानते। तुम्हे जो अच्छा लगे उसीमें विश्वास कर उसे पुकारो  ,तुम उसीके द्वारा उसे पाओगे। मिसरी की ङली चाहे जिस ओरसे ,चाहे जिस ढंग से तोड़ कर खाओ मीठी लगेगी ही। 

मन सफ़ेद कपडा है ,इसे जिस रंगमें डूबोगे वही रंग चढ़ जाएगा। 

व्याकुल प्राणसे जो ईश्वरको पुकारते हैं ,उनको गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है।

सच्चा शिष्य गुरुके किसी बाहरी कामपर लक्ष्य नहीं करता। वह तो केवल गुरुकी आज्ञाको ही सिर नवाकर पालन करता।

पतंग एक बार रौशनी देखकर फिर अन्धकारमें नहीं जाता ,चीटियाँ गुडमें प्राण दे देती है पर वहाँसे लौटती नहीं। इसी प्रकार भक्त जब एकबार प्रभुदर्शनका रसास्वादन कर लेते हैं ,तो उसके लिये प्राण दे देते हैं ,पर लौटते नहीं।
संसारमें रहकर जो साधन कर सकते हैं ,यथार्थमें वो ही वीर पुरुष हैं।

संसारमें रहकर सब काम करो ,पर ख़याल रखो कहीं इस्वरके लक्ष्यसे मन हैट न जाय।

कुलटा स्त्रियाँ माता-पिता तथा परिवार माता-पिता तथा परिवारबालोंकी साथ रहकर संसारके सभी कार्य करती है ,प्रभु उनका मन सदा अपने यारमें लगा रहता है। हे संसारी जीव। तुम भी मनको इश्वरमें लगाकर माता-पिता तथा परिवारका काम करते रहो।


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