साधकके भीतर यदि कुछ भी आसक्ति है तो समस्त साधना व्यर्थ चली जाएगी।
जो ईश्वर में नित्य डूबा रहताहै , उसकी प्रेमाभक्ति कभी नहीं सूखती। परन्तु दो -एक दिनकि भक्तिसे ही जो संतुष्ट तथा निश्चिंत रहता है , सिकेपर रखेहुए रिसते घड़ेके जलके समान वह भक्ति दो दिन बाद ही सुख जाती है।
जगतमें ईश्वर ब्याप्त है , पर उनके पानेके लिए साधना करनी पड़ती है।
जिस मनसे साधना करनी है , वही यदि बिषयासक्त हो जाय तो फिर साधना असंभव ही समझो।
जलमें नाव रहे तो कोई हानि नहीं , पर नावमें जल नहीं रहना चाहिए। साधक संसारमें रहे तो कोई हानि नहीं , परन्तु साधकके भीतर संसार नहीं होना चाहिये।
मन और मुखको एक करना ही साधना है।
ईश्वर महान होनेपर भी अपने भक्तका तुच्छ उपहार प्रेमपूर्वक प्रसन्न होकर ग्रहण करते हैं।
जिस आदमीकी ईश्वरके नाममे रूचि है , भगवान् में जिसकी लगन लग गयी है , उसका संसार -विकार अवश्य दूर होगा। उसपर भगवान् की कृपा अवश्य -अवश्य होगी।
अपने सब कर्मफल ईश्वरको अर्पण कर दो। अपने लिए किसी फलकी कामना न करो।
वासना लेशमात्र भी रही तो भगवान नहीं मिल सकते।
अहंकारकी आड़ होनेसे ईश्वर नहीं देख पड़ते। अहंबुद्धिके जातेही सब जंजाल दूर हो जाते हैं।
में प्रभु का दास हूँ , में उसकी संतान हूँ , में उसका अंश हूँ ---ये सतत अहंकार अच्छे है। ऐसे अभिमान से भगवान मिलते हैं।
जिसका (साधन ) यहाँ ठीक है उसका वहां भी ठीक है और जिसका यहाँ नहीं है उसका वहां भी नहीं है।
जिसका जैसा भाव होता है , उसकी वैसा ही फल मिलता है।
सफ़ेद कपड़ेमें थोड़ी भी स्याहिका दाग पडनेसे वह दाग बहुत स्पष्ट दीखता है , उसी प्रकार पवित्र मनुष्य का थोडा दोष भी अधिक दिखलाई देता है।
जिस घरमें नित्य हरि - कीर्तन होता है , वहां कलियुग प्रवेश नहीं कर सकता।
जब भगवान के आश्रित हो रहे हो तो यह न हुआ , वह न हुआ आदि चिंताओं से मत पडो।
विश्वासी भक्त आजीवन भगवान् का दर्शन न मिलकर भी भगवान को नहीं छोड़ता।
संसार कच्चा कुआँ है। इसके किनारेपर खूब सावधानीसे खड़े होना चाहिए। तनिक असावधान होते ही कुएँमें गिर पड़ोगे , तब निकलना कठिन हो जाएगा।
संसारी ! तुम संसारका सब काम करो ; किन्तु मन हर घडी संसारमें विमुख रखो।
कामिनी और कंचन ही माया है। इनके आकर्षणमें पड़नेपर जीवकी सब स्वाधीनता चली जाती है। इनके मोहके कारण ही जीव भव - बन्धनमें पड जाता है।
संसारमें रहनेसे सुख -दुःख रहेगा ही। ईश्वरकी बात अलग है और उसके चरण- कमलमें मन लगाना और है। दुःख के हाथसे छुटकारा पानेका और कोई उपाय नहीं।
साधु -संग करनेसे जीवका मायारूपी नशा उतर जाता है।
जिससे दस आदमी अच्छी प्रेरणा पाते हो तथा शुभ कार्यमें लगते हो तो समझना चाहिए की उसके भीतर भगवान् की विभूति अधिक है।
जो सोचता है में जीव हूँ वह जीव है ; और जो सोचताहै में शिव हूँ , वह शिव है।
जगतमें ईश्वर ब्याप्त है , पर उनके पानेके लिए साधना करनी पड़ती है।
जिस मनसे साधना करनी है , वही यदि बिषयासक्त हो जाय तो फिर साधना असंभव ही समझो।
जलमें नाव रहे तो कोई हानि नहीं , पर नावमें जल नहीं रहना चाहिए। साधक संसारमें रहे तो कोई हानि नहीं , परन्तु साधकके भीतर संसार नहीं होना चाहिये।
मन और मुखको एक करना ही साधना है।
ईश्वर महान होनेपर भी अपने भक्तका तुच्छ उपहार प्रेमपूर्वक प्रसन्न होकर ग्रहण करते हैं।
जिस आदमीकी ईश्वरके नाममे रूचि है , भगवान् में जिसकी लगन लग गयी है , उसका संसार -विकार अवश्य दूर होगा। उसपर भगवान् की कृपा अवश्य -अवश्य होगी।
अपने सब कर्मफल ईश्वरको अर्पण कर दो। अपने लिए किसी फलकी कामना न करो।
वासना लेशमात्र भी रही तो भगवान नहीं मिल सकते।
अहंकारकी आड़ होनेसे ईश्वर नहीं देख पड़ते। अहंबुद्धिके जातेही सब जंजाल दूर हो जाते हैं।
में प्रभु का दास हूँ , में उसकी संतान हूँ , में उसका अंश हूँ ---ये सतत अहंकार अच्छे है। ऐसे अभिमान से भगवान मिलते हैं।
जिसका (साधन ) यहाँ ठीक है उसका वहां भी ठीक है और जिसका यहाँ नहीं है उसका वहां भी नहीं है।
जिसका जैसा भाव होता है , उसकी वैसा ही फल मिलता है।
सफ़ेद कपड़ेमें थोड़ी भी स्याहिका दाग पडनेसे वह दाग बहुत स्पष्ट दीखता है , उसी प्रकार पवित्र मनुष्य का थोडा दोष भी अधिक दिखलाई देता है।
जिस घरमें नित्य हरि - कीर्तन होता है , वहां कलियुग प्रवेश नहीं कर सकता।
जब भगवान के आश्रित हो रहे हो तो यह न हुआ , वह न हुआ आदि चिंताओं से मत पडो।
विश्वासी भक्त आजीवन भगवान् का दर्शन न मिलकर भी भगवान को नहीं छोड़ता।
संसार कच्चा कुआँ है। इसके किनारेपर खूब सावधानीसे खड़े होना चाहिए। तनिक असावधान होते ही कुएँमें गिर पड़ोगे , तब निकलना कठिन हो जाएगा।
संसारी ! तुम संसारका सब काम करो ; किन्तु मन हर घडी संसारमें विमुख रखो।
कामिनी और कंचन ही माया है। इनके आकर्षणमें पड़नेपर जीवकी सब स्वाधीनता चली जाती है। इनके मोहके कारण ही जीव भव - बन्धनमें पड जाता है।
संसारमें रहनेसे सुख -दुःख रहेगा ही। ईश्वरकी बात अलग है और उसके चरण- कमलमें मन लगाना और है। दुःख के हाथसे छुटकारा पानेका और कोई उपाय नहीं।
साधु -संग करनेसे जीवका मायारूपी नशा उतर जाता है।
जिससे दस आदमी अच्छी प्रेरणा पाते हो तथा शुभ कार्यमें लगते हो तो समझना चाहिए की उसके भीतर भगवान् की विभूति अधिक है।
जो सोचता है में जीव हूँ वह जीव है ; और जो सोचताहै में शिव हूँ , वह शिव है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें