ईश्वरके दर्शन इच्छा रखनेवालोंको नाममें विश्वास तथा सत्यासत्यका विचार करते रहना चाहिये।
मनको स्वतंत्र छोड़ देनेपर वह नाना प्रकारके संकल्प, विकल्प करने लगता है।, परन्तु विचाररूपी अंकुशसे मरनेपर वह स्थिर हो जाता है।
हरिनाम सुनते ही जिसकी आखोंसे सच्चे प्रेमाश्रु बह निकलते हैं वही नाम-प्रेमी है।
डुबकी लगाते ही जाओ ,रत्न अवश्य मिलेगा। धीरज रखकर साधना करते रहो ,यथासमय अवश्य ही तुम्हारे ऊपर ईश्वरकी कृपा होगी।
साधुसँगको धर्मका सर्वप्रधान अंग समझना चाहिये।
मरनेके समय मनमें जैसा भाव होता है ,दूसरे वैसी ही गति होती है ,इसीलिये जीवनभर भगवानके स्मरणकी आवश्यकता है ,जिससे मृत्युके समय केवल भगवान ही याद आवें।
बालककी नाईं रोना ही साधकका एकमात्र बल है।
फाल्के बड़े होनेपर फूल अपने -आप गिर जाता है ,इसी प्रकार देवत्वके बढ़नेसे नरटवा नहीं रहता।
मनुष्य तभीतक धर्मके विषयमें तर्क-वितर्क करता है ,जबतक उसे धर्मका स्वाद नहीं मिलता। स्वाद मिलनपर वह चुपचाप साधन करने लगता है।
साधक जब गद्गद हो पुकारता है ,तब प्रभु बिलम्ब नहीं कर सकते।
ईश्वरके अनंत नाम है ,अनन्त रूप है ,अनंत भाव है। उसे किसी नामसे किसी रूपसे और किसी भावसे कोई पुकारे वह सबकी पुकार सुन सकता है ,वह सबकी मनःकामना पूरी कर सकता है।
परमात्मा एक है ,उसको अनेक लोग अनेक भावोंसे भजते हैं।
जिस हृदयमें ईश्वरका प्रेम प्रवेश कर गया उस हृदयसे काम ,क्रोध ,अहंकार आदि सब भाग जाते हैं। वे फिर नहीं ठहर सकते।
सब धर्मोंका आदर करो ,पर आपने मनको अपनी ही धर्मनिष्ठा से तृप्त करो।
साधन-भेजनेके द्वारा मनुष्य ईश्वरको पाकर फिर अपने धाम को लौट आजाता है।
ईश्वर हुम्लोगोंके निजके हैं ,वह हुम्लोगोंकी अपनी माता हैं। उनके पास हुम्लोगोंका जोर करना ,मचलना चलसकता है।
ईश्वर आपने आनेके पूर्व साधक के हृदयमें प्रेम ,भक्ति ,विश्वास तथा व्याकुलता पहले ही भर देते हैं।
हृदय स्थिर होनेसे ही ईश्वरका दर्शन होता है। हृदय- सरोवर में जबतक कामनकी हवा बहती रहेगी ,तबतक ईश्वरका दर्शन असंभव है।
सच्चे विश्वासी भक्तिका विश्वास तथा भक्ति किसी प्रकार नष्ठ नहीं होती। भगवत चर्चा होते ही वह उन्मत्त हो उठता है।
विश्वासी भक्त ईश्वरके सिवा सांसारिक धन -मान कुछ भी लेना नहीं चाहता।
संसारमें ईश्वर ही केवल सत्य है और सभी असत्य है।
दुर्लभ मनुष्य -जन्म पाकर जो व्यक्ति ईश्वरकी प्राप्तिके लिये यत्न नहीं करता उसका जन्म वृथा ही है।
ईश्वरमें भक्ति और अटूट निष्ठा करके संसारका सब काम करनेमें जीव संसार -बंधनों नहीं पड़ता।
जो ईश्वरका चरण -कमल पकड़ लेता है ,वह संसारसे नहीं डरता।
ईश्वरके चरण -कमल पकड़कर संसारका काम करो ,बन्धनका दर नहीं रहेगा।
मनको स्वतंत्र छोड़ देनेपर वह नाना प्रकारके संकल्प, विकल्प करने लगता है।, परन्तु विचाररूपी अंकुशसे मरनेपर वह स्थिर हो जाता है।
हरिनाम सुनते ही जिसकी आखोंसे सच्चे प्रेमाश्रु बह निकलते हैं वही नाम-प्रेमी है।
डुबकी लगाते ही जाओ ,रत्न अवश्य मिलेगा। धीरज रखकर साधना करते रहो ,यथासमय अवश्य ही तुम्हारे ऊपर ईश्वरकी कृपा होगी।
साधुसँगको धर्मका सर्वप्रधान अंग समझना चाहिये।
मरनेके समय मनमें जैसा भाव होता है ,दूसरे वैसी ही गति होती है ,इसीलिये जीवनभर भगवानके स्मरणकी आवश्यकता है ,जिससे मृत्युके समय केवल भगवान ही याद आवें।
बालककी नाईं रोना ही साधकका एकमात्र बल है।
फाल्के बड़े होनेपर फूल अपने -आप गिर जाता है ,इसी प्रकार देवत्वके बढ़नेसे नरटवा नहीं रहता।
मनुष्य तभीतक धर्मके विषयमें तर्क-वितर्क करता है ,जबतक उसे धर्मका स्वाद नहीं मिलता। स्वाद मिलनपर वह चुपचाप साधन करने लगता है।
साधक जब गद्गद हो पुकारता है ,तब प्रभु बिलम्ब नहीं कर सकते।
ईश्वरके अनंत नाम है ,अनन्त रूप है ,अनंत भाव है। उसे किसी नामसे किसी रूपसे और किसी भावसे कोई पुकारे वह सबकी पुकार सुन सकता है ,वह सबकी मनःकामना पूरी कर सकता है।
परमात्मा एक है ,उसको अनेक लोग अनेक भावोंसे भजते हैं।
जिस हृदयमें ईश्वरका प्रेम प्रवेश कर गया उस हृदयसे काम ,क्रोध ,अहंकार आदि सब भाग जाते हैं। वे फिर नहीं ठहर सकते।
सब धर्मोंका आदर करो ,पर आपने मनको अपनी ही धर्मनिष्ठा से तृप्त करो।
साधन-भेजनेके द्वारा मनुष्य ईश्वरको पाकर फिर अपने धाम को लौट आजाता है।
ईश्वर हुम्लोगोंके निजके हैं ,वह हुम्लोगोंकी अपनी माता हैं। उनके पास हुम्लोगोंका जोर करना ,मचलना चलसकता है।
ईश्वर आपने आनेके पूर्व साधक के हृदयमें प्रेम ,भक्ति ,विश्वास तथा व्याकुलता पहले ही भर देते हैं।
हृदय स्थिर होनेसे ही ईश्वरका दर्शन होता है। हृदय- सरोवर में जबतक कामनकी हवा बहती रहेगी ,तबतक ईश्वरका दर्शन असंभव है।
सच्चे विश्वासी भक्तिका विश्वास तथा भक्ति किसी प्रकार नष्ठ नहीं होती। भगवत चर्चा होते ही वह उन्मत्त हो उठता है।
विश्वासी भक्त ईश्वरके सिवा सांसारिक धन -मान कुछ भी लेना नहीं चाहता।
संसारमें ईश्वर ही केवल सत्य है और सभी असत्य है।
दुर्लभ मनुष्य -जन्म पाकर जो व्यक्ति ईश्वरकी प्राप्तिके लिये यत्न नहीं करता उसका जन्म वृथा ही है।
ईश्वरमें भक्ति और अटूट निष्ठा करके संसारका सब काम करनेमें जीव संसार -बंधनों नहीं पड़ता।
जो ईश्वरका चरण -कमल पकड़ लेता है ,वह संसारसे नहीं डरता।
ईश्वरके चरण -कमल पकड़कर संसारका काम करो ,बन्धनका दर नहीं रहेगा।
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