सोमवार, 9 मई 2016

सत्संग से गुरुकृपा की लहर

चित्तसे  जबतक  प्रपंच  बिलकुल उत्तर  नहीं  जाता , तबतक  परमार्थ  नहीं  सूझता , नहीं  भाता , नहीं ठहरता।  मनोभूमि  जब वैराग्य  से  शूद्ध  हो जाती है , तब  उससे  बोया हुआ  ज्ञानबीज  अंकुरित  होता  है।

सतत  सत्संग , सैट-संग  का  अध्ययन , गुरुकृपा  और  आत्मारामकी  भेट -यही  वह  क्रमसे  जीव  संसार के  कोलाहल से  मुक्त  होता है।

प्रारब्धवश  जिस  जातिमे  हम  पैदा  हुए  उसी  जातिमे  रहकर  तथा  उसी  जातिके  कर्म  करते हुए  प्रेमसे  नारायण का  भजन  करे  और तर जाएँ --इतना  ही अपना  कर्तब्य  हे।

सुगम  मार्ग  से चलो  और  सुखसे  राम-कृष्ण  हरिनाम  लेते चलो।  वैकुंठका  यही  अच्छा  और समिपका  रास्ता  है।

जिस  सत्संगसे  भगवत्प्रेम  उदय  होता है  वही  सत्संग  है , बाकि  तो  नरकनिबास  है।

संतोंके द्वारपर  श्वान  होकर  पड़े  रहना  भी  बड़ा  भाग्य  है , क्योंकि  वहाँ  प्रसाद  मिलता  हे  और  भगवान्  का  गुणगान  सुननेमें  आता  हे।

कीर्तन  का  अधिकार  सबको है , इसमें  वर्ण या  आश्रमका  भेद -भाव  नहीं।




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