शम -दम आज्ञाकारी सेवक होकर सेवक होकर भक्तके द्वारपर हाथ जोड़े खड़े रहते है। ऋद्धि -सिद्धि दासी बनकर घरमे काम करती है। विवेक टहलुआ सदा हाजिर ही रहता है।
भक्तके प्रत्येक शवदसे प्रभुकी ही वार्ता उठती है और श्रोता सुनकर तल्लीन हो जाता है।
चारो मुक्ति मिलकर भक्तके घर पानी भरती है और श्रीके साथ श्रीहरि भी उसकी सेवामे रहते है ---औरोकी बात ही क्या है ?
भक्त भगवानकी आत्मा हे , वह भगवानका जीवन है प्राण है।
प्रभु पूर्णतः भक्तके अंदर है और भक्त पूर्णतः भगवानके अंदर है।
साधनोमे मुख्य साधन श्रीहरिकी भक्ति ही है। भक्तिमें भी नाम कीर्तन विशेष है --नामसे चित शुद्धि होती है --साधकोंकी चित्त - शुद्धि होती है --साधकोंकी स्वरुप -स्थिति प्राप्त होती है।
नाम --जैसा और कोई साधन नहीं है। नामसे भव -बंधन कट जाते हैं।
मन ने सबको बाँध रखा है। मनको बाँधना आसान नहीं। मनने देवताओंको पस्त कर डाला। वह इन्द्रिओंको क्या समझता है। मनकी भार बड़ी जबरदस्त है। मनके सामने कौन ठहर सकता है।
हरिसे हिरा काटा जाता है। वैसे ही मनसे मन पकड़ा जाता है , पर यह भी तब होता है जब पूर्ण हरी कृपा होता है।
मन ही मनका बोधक , मन ही मनका साधक , मन ही मनका बाधक और मन ही मनका घातक है।
अष्टांगयोग , वेदाध्ययन , सत्यवचन तथा अन्य जो -जो साधन है , उन सधोनो से जो कुछ मिलता है वह सब भगवत्भजनसे प्राप्त होता है।
निरपेक्ष ही धीर होता है। धैर्य उसके चरण छूटा है। जो अधीर है उससे निरपेक्षता नहीं होती।
कोटि -कोटि जन्मोंकी अनुभवके बाद निरपेक्षता अति है। निरपेक्षता से बढ़कर कोई साधन नहीं।
एकान्त भक्तिका लक्षण यह है की भगवान् और भक्तका एकान्त होता है। भक्त भगवान्में मिल जाता है और भगवान् भक्तोंमे मिल जाते हैं।
जिसकी भेदबुद्धि नहीं रही , जिसे संतत्वका बोध हो गया , उसीको सर्वत्र भगवत्स्वरुपके अनुभवका परमानन्द प्राप्त होता है।
जो सदा सम भावमे एकाग्र रहते हैं , प्रभुके भजन में ही तत्पर रहते हैं , वे प्रकृतिके पार पहुंचकर प्रभुके स्वरूपको प्राप्त होते हैं।
जिसके ह्रदय मे विषयसे विरक्ति हो , अभेदभावसे श्रीहरिचरनोमे भक्ति हो , भजनमे अनन्य प्रीति हो उसके स्वयं श्रीहरि ही आज्ञां कारक है।
जो शिश्नोदरभोगमे ही आसक्त है , जो अधर्म्मे रत है , ऐसे विषयसक्तोंको असाधु समझो। उसका संग मात करो। कर्मणा, वाचा , मनसा उसका त्याग कर दो।
जो बड़ा भरी विरक्त बनता है , पर हृदयमे अधर्मकामरत रहता है , कामवश द्वेष करता है वह भी निश्चित कुसंग है।
जो बड़ा सात्विक बनता है , पर ह्रदय में संतोंकी दोष देखता है वह अतिदुष्ट दुःसंग है।
पर सबसे मुख्य दुःसंग अपना ही काम है , अपनी ही सकमता है। इसे समूल त्याग देनेसे ही दुःसंगता त्यागी जाती है। उस काम -कल्पनाको जो नर त्यागता है , उसके लिए संसार सुख स्वरुप होता है।
उस काम -कल्पना को त्यागनेका मुख्य साधन केवल सत्संग है। संतोंके श्रीचरणोंको वंदन करनेसे काम मारा जाता है।
सत्संगके बिना जो साधन है , वह साधकोंको बांधनेवाला कठिन बंधन है। सत्संग के बिना जो त्याग है , वह केवल पाखंड है।
मन ही मनका बोधक , मन ही मनका साधक , मन ही मनका बाधक और मन ही मनका घातक है।
अष्टांगयोग , वेदाध्ययन , सत्यवचन तथा अन्य जो -जो साधन है , उन सधोनो से जो कुछ मिलता है वह सब भगवत्भजनसे प्राप्त होता है।
निरपेक्ष ही धीर होता है। धैर्य उसके चरण छूटा है। जो अधीर है उससे निरपेक्षता नहीं होती।
कोटि -कोटि जन्मोंकी अनुभवके बाद निरपेक्षता अति है। निरपेक्षता से बढ़कर कोई साधन नहीं।
एकान्त भक्तिका लक्षण यह है की भगवान् और भक्तका एकान्त होता है। भक्त भगवान्में मिल जाता है और भगवान् भक्तोंमे मिल जाते हैं।
जिसकी भेदबुद्धि नहीं रही , जिसे संतत्वका बोध हो गया , उसीको सर्वत्र भगवत्स्वरुपके अनुभवका परमानन्द प्राप्त होता है।
जो सदा सम भावमे एकाग्र रहते हैं , प्रभुके भजन में ही तत्पर रहते हैं , वे प्रकृतिके पार पहुंचकर प्रभुके स्वरूपको प्राप्त होते हैं।
जिसके ह्रदय मे विषयसे विरक्ति हो , अभेदभावसे श्रीहरिचरनोमे भक्ति हो , भजनमे अनन्य प्रीति हो उसके स्वयं श्रीहरि ही आज्ञां कारक है।
जो शिश्नोदरभोगमे ही आसक्त है , जो अधर्म्मे रत है , ऐसे विषयसक्तोंको असाधु समझो। उसका संग मात करो। कर्मणा, वाचा , मनसा उसका त्याग कर दो।
जो बड़ा भरी विरक्त बनता है , पर हृदयमे अधर्मकामरत रहता है , कामवश द्वेष करता है वह भी निश्चित कुसंग है।
जो बड़ा सात्विक बनता है , पर ह्रदय में संतोंकी दोष देखता है वह अतिदुष्ट दुःसंग है।
पर सबसे मुख्य दुःसंग अपना ही काम है , अपनी ही सकमता है। इसे समूल त्याग देनेसे ही दुःसंगता त्यागी जाती है। उस काम -कल्पनाको जो नर त्यागता है , उसके लिए संसार सुख स्वरुप होता है।
उस काम -कल्पना को त्यागनेका मुख्य साधन केवल सत्संग है। संतोंके श्रीचरणोंको वंदन करनेसे काम मारा जाता है।
सत्संगके बिना जो साधन है , वह साधकोंको बांधनेवाला कठिन बंधन है। सत्संग के बिना जो त्याग है , वह केवल पाखंड है।