बुधवार, 2 सितंबर 2015

अमृत वाणी

पहले  ईश्वरको  प्राप्त  करनेकी  चेष्टा  करो।   गुरुवाक्यमें  विश्वास  करके  कुछ  कर्म  करो।  गुरु  न  हो  तो  भगवान के  पास  व्याकुल  प्राणसे  प्रार्थना  करो।  वह  उन्हीकी  कृपासे  मालूम हो  जायेगा।

सांसारिक  पुरुष  धन , मान , बिषयादि  असार  वस्तुओंका  संग्रह  कर  सुखकी  आशा  करते  हैं।  परन्तु  वह  सब  किसी  प्रकारकी  सुख  नहीं  दे  सकते। 

भगवान्  जीवको  पापसे  लिपटा  रहने  नहीं  देता।  वह  दया कर  झट  उसका  उद्धार  कर  देता  है। 

पूर्व  दिशा में  जितना  ही  चलोगे  पश्चिम  दिशा  उतनीही  दूर  होती  जाएगी।  इसी  प्रकार  धर्म  पथपर  जितना  ही  अग्रसर  होओगे , संसार  उतनीही  दूर  पीछे  छूटता  जाएगा। 

कलियुगमें  प्रेम पूर्ण  ईश्वरकी  ही  सर्वश्रेष्ठ  तथा  सार  वस्तु  है। 

भगवान्  सबको  देखते हैं , किन्तु  जबतक  वे किसीको  अपनी  इछा से  दिखाई  नहीं  देते  तबतक  कोई  उनको  देख या  पहचान  नहीं  सकता।

प्रेमसे  हरिनाम  गाओ।  प्रेमसे  कीर्तन - रंगमें  मस्त  होकर  नाचो।  इससे  तरोगे , तरोगे।  संसारसे  तर  जाओगे।

गुरु  ही  माता , गुरु  ही  पिता  और  गुरु  ही  हमारे  कुलदेव  है।  महान  संकट  पड़नेपर  आगे  पीछे  वही  हमारी  रक्षा  करनेवाले  हैं।  यह  काया , वाक्  और  मन  उन्हीकी  चरणोंमें  अर्पण है।

कीर्तनसे  स्वधर्मकी  बृद्धि  होती  है , कीर्तनसे  स्वधर्मकी प्राप्ति  होती  है , कीर्तनकी  सामने  मुक्ति  भी लज्जित  होकर  भाग  जाती है।

कलियुगमें  नाम स्मरण  और  हरी  कीर्तनसे  जीवमात्रका  उद्धार  होता  है।

सब  दानोंमेसे  श्रेष्ठ  दान अन्नदान  है  और उससे  भी श्रेष्ठ  दान ज्ञान दान  है।

बैठकर  राम-नामके  ध्यानका  अनुष्ठान  करें , उसीसे  मनको  दृढ़  कर  एकनिष्ठ  भावसे  मग्न  हो।  इससे  बढ़कर  कोई  साधन है  नहीं।

परद्रव्य  और  परदाराको  छूत  मानें।  इससे  बढ़कर  निर्मल  कोई तप  नहीं  है।

इस  कलियुगमें  राम -नाम के  सिवा  कोई  आधार  नहीं  है।

मनमें  भगवान् का  रूप  ऐसा  आकर  बैठजाए  की  जाग्रत , स्वप्न और सुसुप्ति  कोई  भी  अवस्था  याद  न  आवे।

इन  कानोंसे  तेरा  नाम  और गुण  सुनूंगा।  इस  पैरोंसे  तीर्थोंकी  ही  रास्ते  चलूँगा।  यह  नश्वर  देह  किस  कामकी ?

भगवन ! मुझे  ऐसी  प्रेम भक्ति  दे  की  मुंहसे  तेराही  नाम  अखण्डरूपसे  लेता  रहूँ।

अपनी  स्तृति  और  दूस्ररोंकी  निंदा , है  गोविन्द ! में  कभी न करूँ।  सब  प्राणिओंमें  है  राम  ! में  तुम्हे  ही  देखूं  और  तेरे  प्रसादसे  ही  संतुष्ट  रहूँ।

भगवान्का  आवाहन  किया , पर  इस  आवाहनमें  विसर्जनका  कुछ  काम  नहीं।  जब  चित्त  उसीमें  लीन  होता  है  तो  गाते   भी  नहीं  बनता।

जो  सब  देबोंका  पिता है , उसके  चरोंोकि  शरण  लेते  ही  साडी  माया  छूट  जाती  है , सब  संदेह  नष्ट  हो  जाते  हैं।

वह  ज्ञानदीप  जलाया  जिससे  चिन्ताका  कोई  काजल  नहीं  और आनंद  भारित  प्रेमसे  देवाधिदेव  श्रीहरिकी  आरती  की। .सब भेद  और विकार  उड़  गए।

भीतर -बाहर , चर - अचरमें  सर्बत्र  श्रीहरि  ही  बिराज  रहें हैं।  उन्होंने  मेरा  मन  हर  लिया , मेरा - तेरा  भाव  निकाल दिया।

योग , तप , कर्म  और  ज्ञान --ये  सब भगवन के  लिए  है।  भगवान् के  बिना  इनका  कुछभी  मूल्य  नहीं  है।

भगवानके  चरणोंमें  संसारको  समर्पित  करके  भक्त  निश्चिन्त  रहते  हैं  और  तब  वह  सारा  प्रपंच  भगवान् का  ही  हो  जाता  है।

गंगा  सागरसे  मिलने  जाती  है ; परन्तु  जाती  हुई  जगत् का  पाप - ताप  निवारण  करती  है। उसी प्रकार आत्मस्वरूपको  प्राप्त  जो  संत  है  वे  अपने  सहज  कर्मोंसे  संसारमें  बंधे  बंदिओंको  छुड़ाते  हैं।